Sunday, April 24, 2016

बडप्पन ।

बडप्पन ही  बन चुका
लक्ष्य मेरा
ओर यही जीवन मूल्य
करता जाता हर काम
जिससे युग पहचान बने
संघर्ष जीवन
इसी निमित्त हर पल
विभिन्न आयामों में उत्सुक
पाना अस्तित्व
अपना प्रवेश दौडता मानव
लगातार अथक रहती प्रतिस्पर्द्धा
ओर आशक्ति का यह खेल
चलता रहता
यही संसार यही मोह यही माया
अहंकार निमित्त जीवन
अर्पित कर देता अपना सर्वस्व
 विष सम अहंकारी सर्प के शरण
श्याम विषेला सर्प देता दंश
विष पाया
व्यक्ति नही रह पाता सरल
बनने लगता शैतान
ईश्वरीय मार्ग से भटकता
प्रवेश करता
पाशविकता के संसार
जहां हृदय नही
शैतानी शक्ति का राज
ओर वही तय होता भाग्य
बडप्पन तामसिक प्रवृति का सम्राट
नही रह सकता मानव
अहंकार हीन व्यक्ति सरलतम ही
सरिता बन बहता सागर तक
ओर पाता विलय
सागर मे अपने अस्तित्व संग ।
छगन लाल गर्ग ।