नन्हें से हाथ
मेरे
कमजोर विकलांग
नहीं पहुँच पाते
सत्ता के गलियारों तक
अनंत ठेकेदार मांगते हिसाब
जिन्दगी जीने का
सत्ताधारियों के
बड़ी क्रूर आँखों ओर
चेहरों के स्वामी
डर लगता मिलते
भरे पूरे परिवार का मोह
डराता खिलाफत से
हो चुका आज शासन
विराट विस्तृत अस्पृर्शीय
अहंकार भरता दंभ
आक्रांत विजेता की तरह
खो चुका शिक्षा
प्रतिभा की लंबी फरहिस्ते
क्षमताओं से भ्रमित
असीम प्रभुत्व नकारता
लडखडता मांगता जाता
जिन्दगी जीने का सौदा
बढता निरंतर विभत्स
कामनाओं का प्रलय
भावनाओं का विकल स्वर
रौदता मानवता का मर्म
नहीं परवाह अपनी श्वासों की
चाहता अपनों की श्वास
जो आश्रित मुझ पर
ओर तब उठता जागता
भीतर सोया
उभरना चाहता शैतान बन
शक्ति केवल शक्ति का संग्रहण
लालसा जीता
प्रभुत्व का शैतान
मूल्यों का संविधान
करता खिलवाड़ अपनी गरज
नित नयी व्याख्याओं का दौर
चलता आज
अहंकार तर्क बनता
रक्षकों से न्याय की उम्मीद
केवल
सक्षम शक्तिमान
ऊँचे उठों की दोलत बल
क्या हो नन्हे हाथों का
स्वीकार्य केवल प्रार्थना निमित्त
जीना चाहे तो यही मात्र उपाय
जिन्दगी जीने का
सत्य यही सामान्य जीवन
नकारा हो चुके
रद्दी कबाड की तरह ।
छगन लाल गर्ग ।