निर्धारित मापदंड
यांत्रिक कर देता जीवन
नव सृजन क्षण होते दमित
मूल्यों की बेडियाँ
बाँधे रखती मनुष्य का स्पंदन
अधिकांश बार
मूल्यों के भय छूट जाते
मानवीय संवेदना कर्म
नहीं होती हिम्मत रीतियों विरुद्ध
सत्य पावन ओर सहृदय जीना
मानव बन संवेदनशील पल
ओर सभ्यता देती चमक
बनावटी बेअर्थ वैभव धुन
जिसमें पीसती जाती
मानवता
ओर छल साम्राज्य हुआ जाता
आच्छादित नैतिक मूल्यों पर
नहीं मिलती झलक
कि व्यथित अहसास हो कहीं
वात्सल्य स्नेह
या औलाद कर्तव्य बोध
धंसता जा रहा युग स्वार्थ के अज्ञात कुएँ
क्या कहूँ
घनी उद्र भ्रांत दशा भटकन मात्र
यह जीवन
स्वार्थ पूर्ति प्रयास ले डूबता नित्य
अनीति कदाचार ओर शोषण के ताल
उधर मापदंडों की स्वीकृति
मूक मन मिलती रहती
ओर युग प्रगति का यह नया आयाम
होता जाता यांत्रिक मानव
आत्माहीन संवेदना शून्य
बौद्धिकता की सीढ़ी से उठना होगा
थोड़ा ऊपर
करो ना पकड ढीली
बढ़ो आगे मानवता की ऊँची सीढ़ी
वहीं ले जाती दिव्यता की मंजिल
अन्यथा
जीवन पाये भी अनपाया सा
बिना मानव मर्म पाये।
पशुवत ही काल खींचता निरंतर ।
छगन लाल गर्ग।
यांत्रिक कर देता जीवन
नव सृजन क्षण होते दमित
मूल्यों की बेडियाँ
बाँधे रखती मनुष्य का स्पंदन
अधिकांश बार
मूल्यों के भय छूट जाते
मानवीय संवेदना कर्म
नहीं होती हिम्मत रीतियों विरुद्ध
सत्य पावन ओर सहृदय जीना
मानव बन संवेदनशील पल
ओर सभ्यता देती चमक
बनावटी बेअर्थ वैभव धुन
जिसमें पीसती जाती
मानवता
ओर छल साम्राज्य हुआ जाता
आच्छादित नैतिक मूल्यों पर
नहीं मिलती झलक
कि व्यथित अहसास हो कहीं
वात्सल्य स्नेह
या औलाद कर्तव्य बोध
धंसता जा रहा युग स्वार्थ के अज्ञात कुएँ
क्या कहूँ
घनी उद्र भ्रांत दशा भटकन मात्र
यह जीवन
स्वार्थ पूर्ति प्रयास ले डूबता नित्य
अनीति कदाचार ओर शोषण के ताल
उधर मापदंडों की स्वीकृति
मूक मन मिलती रहती
ओर युग प्रगति का यह नया आयाम
होता जाता यांत्रिक मानव
आत्माहीन संवेदना शून्य
बौद्धिकता की सीढ़ी से उठना होगा
थोड़ा ऊपर
करो ना पकड ढीली
बढ़ो आगे मानवता की ऊँची सीढ़ी
वहीं ले जाती दिव्यता की मंजिल
अन्यथा
जीवन पाये भी अनपाया सा
बिना मानव मर्म पाये।
पशुवत ही काल खींचता निरंतर ।
छगन लाल गर्ग।