Friday, April 15, 2016

अलौकिक क्षण ।


दे दो प्रिये मुझे अब
मृदु रागिनी स्वर
आह्लाद भरा तन
रसिक मन तंरगित नाद
विकल प्राण बने
वियोग विरल राग
अकेलेपन का विकल विशाद
बहना चाहे प्रिय तेरी ओर
हुआ कमनीय गात
दो ना प्रिय अब
कोई संयोग रागिनी स्वर
मन भ्रमित भार
मृदुल रस स्वाद पान
आह यह
शब्द कलिका की मार
स्पंदित करती विरह घाव अपार
तंरगित वीणा से तार विरल
भरते कानों से
मधुमय रस शब्द सार
गूँज उठते
अलौकिक नाद अपार
स्वप्नवत पवनमय
अदृश्य जीवन संसार
प्रिय खोजूं कहां
भटकी पवन किरण
विवर शून्य हुआ रे
अब सहलाता नहीं
स्मृति राग विकल
घने करूण भार बने
आह यह जीवन
मरू धरा शुष्क तन रहा
अचेतन मुस्कान व्योम
तुम्हारी रश्मि बनी
अपलक नयन
स्थितप्रज्ञ बन जड मेरे हुए
भेजो पवन मिस संदेश राग
विरह जलन अब अस्तित्व जला रही
दे दो वहीं से अधर मुस्कान सार
या कि भेजो
कोई रागिनी स्वर
महाविलय क्षण
संकेत नभ दे रहा
प्राण राग द्रव्य हुआ
रश्मि संग बह रहा
अनंत का यह संयोग सार
आओ ना प्रिये उर पहन हार
लक्षण अलौकिक
आभामय नभ ने दिये
संयोग महामिलन अलौकिक क्षण
पुकार नभ आभामंडल बनी ।
छगन लाल गर्ग ।