आह कितना मुझे
विभूत्ता का नशा देखा भुगता
उतरता ही नहीं
ना घर ना बाहर ना रात ना दिन
आठो प्रहर बस रहता यही
वैभव दरिया बन तैरता आँखों
निखिल विश्व आ पडा कदमों में
घनी अनुभूति संसार तुच्छ नहीं
महान नजर आता
धरातल नहीं असमतल बिखराव
सब दिखते रंगों भरे जहान
एक मायिक मृदंग मुझे
नाच नचाता तृष्णा का
ओर गिर गिर जाता केवल मैं
अभी अनाडी
नाच ना पाता माया संगीत
नाचते नाचते छल मोह से
सुखते कंठ
नहीं उभरते चेतन राग
उथल गया चेतन
नीर मिल गया कीचड संग
नहीं विभेद भीतर बाहर
गंदगी मे अहसास
सुगंध पाता सुगंध सार
वैभव जाल माया जकडा
कैसे बचें
नहीं नाव नहीं नाविक नहीं प्राण
भीतर नहीं चेतन सार
आह परिताप ही घना ज्वाल
यही विभूता देती परिणाम ।
छगन लाल गर्ग ।