क्या जाना कभी
अपनत्व का कोष
नहीं शायद
अस्मिता का आकलन सजगता देता
ओर निरंतर सचेत रहता
निभाता जाता वफादारी
विराट काल दूत प्रभुत्व धारी
असूर अस्तित्व विस्तृत जाल घेरे
नमित हुआ काल की कालिमा घूला
व्यथित विकल देखता राह रश्मि जाल
सुकोमल गात बीच विकसता जाता
सूर सौन्दर्य नूर विनाश निमित्त
समय का पहिया ले रहा निरंतर गति
सुकाल की अस्मिता निमित्त ।
छगन लाल गर्ग ।
अपनत्व का कोष
नहीं शायद
अस्मिता का आकलन सजगता देता
ओर निरंतर सचेत रहता
निभाता जाता वफादारी
विराट काल दूत प्रभुत्व धारी
असूर अस्तित्व विस्तृत जाल घेरे
नमित हुआ काल की कालिमा घूला
व्यथित विकल देखता राह रश्मि जाल
सुकोमल गात बीच विकसता जाता
सूर सौन्दर्य नूर विनाश निमित्त
समय का पहिया ले रहा निरंतर गति
सुकाल की अस्मिता निमित्त ।
छगन लाल गर्ग ।