Monday, April 25, 2016

हमराही ।

सामान्य धरातल का राही
भयभीत हो उठता
जब पाता राह की उठान ओर उतराई
नही तजुर्बा नये रास्तों का
चाहत होती मिले कोई साथ
ओर हो सके राजी चलने निमित्त
आगे की यात्रा का हमराही बनकर
सत्य यह भी कि चढाई का बल पूर्ववत
नही बढा घटा साथी के सहारे से
या हमराह बनने से
केवल एक अदृश्य आस्था ठहरी गहरे
कि ओर भी
मेरी तरह अनभिज्ञ रास्तों में
उठाता जोखिम आगे बढने की
असहज नही रह पाता मन
असुरक्षित मनोभाव लेते राहत
पर यह यात्रा स्थूल शरीर तक सीमित
एक चढाई रह जाती रहस्यमय
त्याग करना होता स्थूल
सूक्ष्म की यात्रा निमित्त
नही काम आता हमराह
चलना होता अकेले हर अज्ञात कदम
नही धरातलीय अनुभव की जरूरत
अच्छे कर्मो के छाये हर कदम चलते साथ
बचाने निमित्त हर आपदा अज्ञात से
स्थूल जीवन सूक्ष्म तैयारी निमित्त
इसी धरातल उठाने होंगे कदम
विश्वास स्थिर रहे
प्रभु दिशा उठे कदम व्यर्थ नही जाते ।
छगन लाल गर्ग ।