Thursday, April 7, 2016

अहं तुष्टता ।


तुष्ट हो रहा अहं
डराता बाद में
अभिव्यक्ति के बाद
अहं विद्वता की जिद्धोजहद
करता नहीं थकता
हल्की सी सफलता का संकेत
भूचाल सा हुगदड मचाता
हृदय तंरगो का खजाना
बार बार होता जाता
उथाह से खाली
अब नहीं चित मे तनिक भी
उछाह संकेत
अपनी विद्धवता का पिटारा
थोड़ा सा
दोस्तों के समक्ष हो चुका खाली
ओर दोस्त दोस्ती लिहाज
करते रहे बर्दाश्त मुझे
बेबूझ ज्ञानी
गहन गहरा अंधकार भरा
अज्ञात खालीपन पसरा पड़ा अब
हृदय भावों के समन्दर
व्याप्त होता जाता खालीपन मे
डराता  विनष्ट करता अस्तित्व
नहीं आता समझ
यह दशा ज्ञान भराव की
या कि खालीपन अज्ञान के भय की
शायद सत्य जानना असंभव ।
छगन लाल गर्ग ।