आशा किरण उतरार्द्ध
अकेलापन
पारिवारिक भीड़ बीच
नहीं पाता कोई मेरा अपना
महसूस होता सत्य
नितान्त हो चुका अकेला रिक्त
बुढ़ापा लगा घेरने
होता प्रतिपल रिक्त प्रेम से
पसंदीदा अब नहीं किसी का
यही सार अब जीवन तेरा
मोह भ्रम बादल अब छंटते
परम अदृश्य के सपने जगते
सुंदर शीतल एकाकीपन मेरा
भर लाता सीपी मे सागर
आह रमणीय मधु भाव अनंत भर
हृदय राग उर्ध्व बन उठते
कैवल्य असीम चित सागर बसता
सीढ़ी बन जाता एकाकीपन
अदृश्य अलौकिक परमेश्वर तक
उडता उन्मादित अलौकिक रमता
आह यह उतरार्द्ध काल बहुमोल
जीवन भर की उपलब्धि भर देता ।
छगन लाल गर्ग ।