गिरते आँसू अविरल
घनी उदास पलकों मे गहरी वेदना
आह यह करूण दृश्य
अपलक एकाग्र चित हुआ पीड़ा नीर
कास नहीं रहता यह जुल्म
दुनिया अच्छी लगती
पीर पहचान नहीं रहती
वेदना विनय बन जीवन भरती
हर अभाव का अपना खजाना
कभी नहीं रीतता
आज अहसास हुआ अस्मिता का
चौट खाई दर्द दरिया हिलोर भरता
यही कहते स्नेह निर्झर
विरह मे उफान भरता
अस्तित्व मिटाता गिरता जाता
विनष्ट तो होना ही लक्ष्य पर
पूरी क्षमता
गतिवान सामर्थ्य सीमा तक
परम स्नेह सागर समाने
यह दर्द के आँसू अति पावन समर्पित
अपने प्रिय निमित्त
राहगीर बने अदृश्य राहो बहते हुए
मिलने को कसक संग प्रिय ।
छगन लाल गर्ग।