Thursday, May 19, 2016

शांत ;


रहने दो खुली खिड़की ताजी हवा आती हैं
दूर दिशाओं का भीगा सा अहसास लाती हैं
बंद करते हो अंदर की उमस दम घौटती हैं
मेरे रहा क्या हैं भीतर जिससे श्वासे चलती हैं ।
बार बार कहते तुम हो मन को समझाओ
दर्द आप केवल नहीं अनेको हैं गिनाओ
जब सब दर्द जीते हैं उन्हें भी समझाओ
हमदर्दी का भाईचारा जीते जी निभाओ।
तनिक से पास बेठो न अच्छा लगता हैं
हमारा क्षणिक जीवन आपसे सारवान हैं
हम रहे न रहे फिर हमारी बातें रह जाती हैं
बातें ऐसी आत्मीय हैं हमारी कुछ देती हैं ।
भार बढते ही दुबक जाते हैं हम
फिर उठने को पूरा बल देते हम
उठते वहीं जो प्रयास मे हरदम
झेल गिरे हम उठना प्रथम हैं अंतिम ।
आवाज तो लगाने दो शायद किसी तक पहुँच पाये
झील तक कमल का दायरा हैं आगे सामर्थ्य खोये
सुगंध पवन के सहारे असीम दायरा बिखराव पाये
आवाज से सहारा मिले तो रस सागर खिंच कर लाये।
सूनेपन से घबराहट होनी स्वाभाविक हैं
यह पंगूता का सत्यता से साक्षात्कार हैं
हमारा दंभ कहता महसूस नहीं होता हैं
अकेलापन इसका अहसास कराता हैं ।
रिश्ते नाते जीने का सहारा होते हैं
व्यस्त रहते जिन्दगी बीत जाती हैं
वरना बड़ा मुश्किल जीवन जीना हैं
अनुभव से कभी यह समझ आती हैं ।
नकारा हुए अब हमारा अर्थ नहीं हैं
भार लगते पर दुनियादारी निभानी हैं
बदला जमाना अनुभव भी नकारा हैं
एकटक लाचार होकर उम्र बीतानी हैं ।
हाथों हाथ लेते अगर कुछ कमा कर लाते
सहभागिता का नाटक करते सब न अघाते
मतलब रहा क्या अब सब अपना ही कमाते
प्यार व्यार का झूठा खेल लोगों मे दिखाते।
अब जो कहता हूँ कभी शायद ही सोचता
जब भावना आघात हुआ कभी नहीं कहता
खाली हृदय बाहर से स्नेह की आशा करता
अपनों के होते क्यों जीवन बाहर की ताकता।
खूब संघर्ष जीया पर अधूरा रहा
अपनों को दिया पर पराया रहा
खुशियाँ आजीवन ओरो देता रहा
आज मुँह फेरो का तमाशा हो रहा।
आज चित हलचल भरा क्यों
दाज जख्म आबाद रहे ज्यौ
आ अतीत अब तू ही हैं क्यों
आजकल तू नादारद हैं क्यों ।
शायद आज ही रहता हैं
कल का आना सपना हैं
भूले ठगे जिन्दगी जीते हैं
अतीत मन का निवास हैं ।
मन तेरा क्या किया जाये
हर ओर से थकान ही आये
तेरे अंधे अरमान क्यों भाये
लडखडाते मन भरोसा आये।
हे मन अब तू झंझट सब छोड
करू विनय जीवन नहीं तोड़
भाग्य किया अब करे तू मोड
विरह दशा से हमे आज छोड।
कल से कैसे आस रखूं मैं
आज तडपन भौग रहा मैं
विरह जाल भंवर फसा मैं
राह उजाले पाऊं कहां मैं ।
फिर आओ तुम अंधेरा घना हैं
रात काली कलूटी घनी घटा हैं
डरावने माहोल मे घूटता दम हैं
मरना निश्चित सहारा भी नहीं हैं ।
सामना तेरा करने का आधार तो हो
झूठा साहस करने की शक्ति तो हो
लिपटा हैं कीचड़ थोड़ी सफाई तो हो
पावन हो लूं भावों से पात्रता तो हो।
अब कैसे कहोगे कोई सुनेगा संभावना हैं
तब कैसे रहोगे कहीं जीव संजीवनी नहीं हैं
सब कहते रहते आज समय बदल गया हैं
हम यूं ही जीते रहे ख्याल नये आये नहीं है।
जैसा भी वक्त होगा गुजारा करना ही होगा
अब किसी ओर के बचा जीवन जीना होगा
लाचारी कितना ही घेरे प्रयास सबल होगा
आशादीप सभी बंवडंरों से बचाना ही होगा।
अंत ऐसा होगा भावों का सोचा न था
कोमल कठोर प्रहार सहे असंभव था
बिखरे सपने धराशायी हुआ नाजुक था
कुचितो के जाल घेरे बीच मै फसा था ।
क्या कहूँ जीवन हैं अभिशाप
सूत्रों का बिखरा हैं अतिताप
सुलझते नहीं यही हैं संताप
विषम दारूण रहा प्राण कांप।
उखडे उखडे प्राण विकल
बचे कैसे भाव सूत्र विमल
जग निर्मित साज हैं धूमिल
आत्मलीन न होते घूलमिल।
उस पार सवेरे सना ऊँचा आकाश तो हैं
इस पार तट का मोह बना रूकावट तो हैं
उस पार सागर की सुमधुर झलक तो हैं
इस पार वासनाओं का घना जाल तो हैं ।
महक अब उठती नहीं खिले फूलों से भी
लहर अब बहती नहीं शांत हैं सागर भी
बयार चलती तेज नहीं हैं ठंडक फिर भी
तरंगों का भाव केवल शब्द बना आज भी।
ठीक नहीं होगा कहीं मानव का सभ्य होना
बीत गया संस्कार की परंपरा से सभ्य होना
सुख कृत्रिम चाहे नया भूले मूल उत्पन्न होना
फिर फिर पायें तृष्णा जनित दुख नया पाना।
दाता कौन समझना मुश्किल
जन्म दाता पालनकर्ता विकल
भरण पोषक रहे उदास काल
मतलब मात्र भरे सब सवाल ।
रिश्ते तार तार होते हैं तो क्या हम सभ्य हैं
रिश्ते दकियानुशी हो निभाते वे असभ्य हैं
परंपरा मे जीना जीवन की असभ्यता हैं
स्वछंद रहते पशु प्रवृत्ति जीये तो सभ्य हैं ।
हाल बेहाल मानव बूरा हुआ जाता हैं
काल कवलित जीवन रौदा जाता हैं
माल पाया अधर्मी धर्म धारक बना हैं
झूठा चालाक व्यक्ति शासनाधीश हैं ।
अपना पराया व्यक्ति का भ्रम ही हैं
पराये अपनों से बेहतर काम देते हैं
बुरे वक्त के हमराही बने साथ देते हैं
अपने मात्र कहने मे उपयोगी होते हैं ।
कहते हैं रिश्ते दार बुरे वक्त साथ देते हैं
करते हैं क्या उम्रभर हमने देखा नहीं हैं
लूटते मिले हैं खुशियों को भुगता घना हैं
काम निकला कि आँखे तरेरे मिलते रहे हैं ।
दुखी होते हैं अगर हमें सुख कतरा मिले कही

शांत;