Saturday, May 7, 2016

शांति कुँज ।

शांति कुँज विहार स्थल
व्यस्त जिन्दगी का शांत स्थल
प्रातः इठलाने लगता
भाँति भाँति के कुसुमों की महक
हो जाती एक रस
भाँति भाँति के लोगों संग
भटकती वायु सा आवेग समेटता
युवा वर्ग
कही बतियाता कही खेलता कूदता
ओर वायु प्रवाह संग
सुकोमल तन से वस्त्र लहराते
भागती दौडती बालायें
घनीभूत हुआ सौंदर्य लगता
नृत्य करता विभोर हुआ मुग्धा सा
उधर पीछे की ओर
मेरे कदमों की पदचाप से
बेफिक्र जोडे
बतियाते मुग्ध हो उठते
एक दूजे से
खोये खोये से
विराग काल की स्मृति मे
हरी हरी दूब पर कसरत करती
विभिन्न कलाबाजी खाती बालायें
निर्देशन में करती जाती आक्रमण
एक दूसरे पर
पेतरे बाजी का अनदेखा
अचंभित करने वाला दृश्य
देखता हूँ अति नजदीक
धीमे कदमो की विवशता में
बहुत पैनेपन के साथ
ठीक सामने बना
चौराहे पर का फव्वारा
बिना पानी का
बैठक जमा चुके किशोर उस पर
करते बेफ्रिक चर्चा स्वयं की
आंगिक उतेजना से बेबूझ मस्ती की
निकलता हूँ पास से
सुनता हंसी का हंगामा
बडी मुश्किल से दंड पेलते
पेटधारी अधेड
शायद संतुलित होने के प्रयास में
हांफते जाते
पीडा झेलते खुद के होने की
ओर इन सबका दर्द भी
राग भी समेटे मैं
घूँटनों के दर्द को भूलता सा
बढता हूँ आगे
आशक्त करती झाडी
एक दूसरे की बांहो मे बांहे डाले
लहराती बुलाती बढता हूँ
नन्ही नन्ही टहनीयों की तरफ
जहां गहरे केसरी रंग के सुकुमार पुष्प
स्वागत मे करते जाते नमन
झुक झुक
विभिन्नता का हर दृश्य देता
एक झलक
जीवन के आयाम निमित्त
कि हो सके
तलाशी मर्मज्ञ जीवन की
समय का यह चक्र भरता
आशा निराशा राग विराग
जीवटता सक्रिय रहने की
ओर सुंदर भावों का झौंका
रह रहकर
देता संकेत गूढ ।
छगन लाल गर्ग ।