Saturday, May 28, 2016

विराग 2


झंझा नित झंकझोर कर दे भ्रम भभक भय भंजना से।
जल जवान बालक बचाकर सम रह संसार विपुल से ।।
सूना हैं संसार मेरा सिर्फ रहा हैं नाम तेरा ।
याद बस शेष घेरा जीवन भरा माल मेरा।।
मैं सिमट रहा हूँ अपने मे परिहास जीवन पाता हूँ ।
दे दूँ अपना सर्वस्व शून्य रहूं ऐसा अनुभव पाता हूँ ।।
मैं जब भी समझने का करता प्रयास खुद को भूल जाता हूँ ।
बोध बढ़े तन रह नहीं पाये नर नार एक ही ब्रह्म पाता हूँ ।।
इस दशा फसा रह जाता हूँ
श्वासों का स्वर रह जाता हूँ
अज्ञात मुसाफिर माफिक हूँ
हर सराय ठौकर खाता हूँ ।
भटक भटक हे जीवन मेरे भूल भूलैया के उपवन मे ।
लहर लहरों की झाग चमकती तरूण सुंदर वासना जिसमे ।।
सागर सागर डोल जीवन पानी पानी सा तरल जीवन ।
सार फिर तू पा ले पावन नीर नीरज विकसित जीवन ।।
पवन का झंकार पाकर सौरभ सुंदर गंध फिर फिर ।
नासिका भर ले जी भर भर रसमय संसार फिर फिर ।।
पल जीवन देगा फिर नहीं
राग घन बरसते फिर नहीं
ताप तन रस घना हैं नहीं
जीवन निस्सार सार नहीं ।
पाकर भी यहाँ कुछ नहीं पाया
खोकर भी यहाँ कुछ नहीं खोया
भूल भूलैया रही यह जीवन माया
जन जीवन सारा भ्रमित जग भाया।
राख घनेरी जीवन नहीं हैं आग घनेरी छांव नहीं हैं ।
तपन तेरे तार महीन हैं झैले इस काबिल नहीं हैं ।।
डगर डगर सांवरियां ढूँढे कदम कदम फासले बड़े ।
रह ना पाया घर मे जमे मेरे नाथ वहीं घर रहे खड़े ।।
करुणानिधि पुकारता गया आँसू सारे हार गये हैं ।
धुंधमय जीवन बन चुका हैं शुष्क तन अब रह गया हैं ।।
प्रेम विरल बन बह गया हैं ।
सुखा मरूस्थल रह गया हैं ।।
झील की स्नेहिल तरंगे अपार अनंत ललक लेकर ।
उतंग शिखर स्वप्नवत हो उठती प्रार्थना का दंभ लेकर।।
जा ना पायी मूल तक तो कैसे कह दूँ सार मन को ।
ढूँढता निस्सार तल तो भूल भूलैया स्वप्न मन को।।
मन खंडित हो गया हैं ।
केवल तू ही रह गया हैं ।।
आयी आंधी अंबार अंधड छा गया स्थित अंधेरा ।
आँख मे असीम कंकड हो ना पायेगा फिर सवेरा।।
आँसूओं का सघन ढेरा छलना के मोह भंवर मे।
ले चला जीवन सुख मेरा चेतना के तीव्र स्वर मे।।
यह कैसा विवाद चल रहा
मानव मन का द्वंद्व चल रहा
बाहर प्रकट झलक नहीं रहा
भीतर तन मन मे ही डूब रहा।
झूठी चाह साबित होगी आसरा अब एक का हैं ।
हठात सबसे मुक्ति होगी भरोसा परमेश्वर का हैं ।।
प्रेम की उस झील का हैं असीम नेह भंडार का हैं ।
सुरभित कुसुम झड गया हैं ठूठ जड देह रह गया हैं ।।
कब तक अब ओर रहेगा हे चेतन तुम कुछ तो बोलो ।
किसे सुनाऊ व्यथा यह गहरी नीरस जीवन ईश ले लो ।।
गल हिम क्या बनेगा पानी मिल सकेगा झील कमल से।
बहता इठलाता रसमय बानी महा मिलन होगा सत से।।
रात हो रही घनी अंधेरी काल कालिमा ने आ घेरा।
लग रहा अब जीवन तो पा नहीं सकता फिर सवेरा।।
ऐसे कैसे बच जीऊं मैं सजल कैसे बन पाऊं मैं ।
नाकाफी राह जीवन की कदम जिस पर रख पाऊं मैं ।।
जीवन हैं विरान निखिल आकर नीर पीर दे गया हैं ।
निष्ठुर ओर स्वप्नवत मोहमय वर्जना दर्द दे गया हैं ।।
सुरभित कुसुम झड गया हैं ।
ठूठ जड़ देह अब रह गया हैं ।।
मानस का सनिकट रेला अपने अपने रट रहा पर ।
निकट होने के समय पर लगता अनंत विराम पर ।।
मेल मन का हो तो कैसे चाहतों का बिखराव
ऐसे।
दूर पट पर बादलों का घना छितरा बिखराव जैसे ।।
हाल मेरा आज औझल तन्हाईयों का जाल बौझिल।
कर सके यह दंभ गाफिल हो सके ऐसा मैं न काबिल।।
क्या हूँ क्या कहूँ अनजान जगसागर मे शून्य सा मान ।
पवन का हल्का सा अहसास पतली टहनी कंपित जान।।
कौन सुनता दर्द मेरा अकेलेपन मे प्राण व्यथित ।
व्यतीत जीवन सारहीन सारा कह न पाया हूँ स्तंभित ।।
वियोग ही हैं शाश्वत सत्य मिलन केवल भ्रामक संचय।
ले चला प्राणों को नित्य दे रहा प्रलोभन यह छलता जगालय ।।
साक्षात्कार नहीं नाम ले हम क्षणिक हैं प्राणों मे दम ।
विरह जीवन घेर तो ले सकाम जीवन ले सके फिर विश्राम ।।
नेह सागर राह बता गया हैं ।
सरिता का वेग दिखा गया हैं ।।
उलझन उलझन खेल अब छोड़ो
मटक मोह का जाल अब तो तोडो
एक नजर स्नेह मिले दर्शन जोड़ो
भारी माया से मुँह तो अब मोडो।
करूणासागर पास खड़े हैं दीदार के गीत बना दूँ।
अपनेपन का थाल सजा हैं शरण कमल मे झूकते रख दूँ ।।
प्राणों पण देकर समझा गया हैं ।
अनंत सुरभि पवन संग दे गया हैं ।।
प्रेम विरल बन बह गया हैं ।
सुरभित कुसुम झड गया हैं ।।
ठूठ जड बन देह रह गया हैं ।
सुखा मरूस्थल तन रहा हैं ।।
जब कभी इजहार होता चेतना मे भार असीम बढ़ता।
मन विगत मे भाग जाता होश विरल हो दरक जाता।।
सुखद सुखद हर पलों को धीरे से सहला भर देती।
ओर यादें मुझे आकर पल पल मे आँखें भर देती ।।
स्मृति की छांव रागिनी घनी हैं राग नेह मिल गुंफन हुआ हैं ।
आत्म तत्व परिवहन हुआ हैं वहीं शेष परिभ्रमण हुआ हैं ।।
वह चिंता मैं कैसे छोडूँ भावी सुखो की जोड़ रखी।
वह आशा अब कैसे छोडूँ शादी बंधन की सोच रखी।।
गंध से सुगंध बने यह निस्सार से सार बने यह।
कली खिले फूल बने यह परमात्मा श्रृंगार बने यह।।