Monday, May 9, 2016

फिक्र हैं ।

फिक्र तो होती मुझे
कि मंजिल मिले
जीवन प्रवाह सुख ना जाये
सागर पहुंच से पहले
फिक्र तो हैं
कि एक सूत्र मिले
दृष्टि मिल सके विधायक
कि दिखाने लगे द्वार
नही यह संचय कि
मार्ग बनते सहारा मंजिल का
या कि फिक्र होती द्वार की
ओर ना ही करता जिद्द
कोई भी हो मार्ग
या द्वार
मेरे लिए मूल्य हैं पहुंच
ओर यह पहुंच
कृष्ण बुद्ध महावीर मोहम्मद
किसी की भी नही
मेरी अपने भाव ओर विधायक दृष्टि
ओरों के चश्मे से
नही पा सकता मैं अपनी मंजिल ।
छगन लाल गर्ग ।