Thursday, May 5, 2016

चलते हो क्या

चलते हो क्या
अब उतरा काल
नही गरज संडास बने हम
सन्यास ले सके
सृजित कुसुम से
अंधेरे घने अनजान राहे
अपने खडे अवसर पाने
जहां स्थापित रहे तुम
अब नही भाता साथ तुम्हारा
अदृश्य हो मूर्त तुम
विवशता लेती इन्तकाम
जब हो जाती बर्दाश्त बाहर
समझ जरूरत बन चुकी अब
दुत्कार शब्द झेलना
योग्यता नही ना ही अभ्यास
अच्छा रहेगा
अनजान अंधेरे रास्ते हमराह बने
हम दोनो
अग्नि साक्षी रहे अंतिम घडी के
देखा जायेगा
गुमनाम रास्ते हमारे लिए
ईश्वरीय सौगात
नही मिटता जलील होता स्वाभिमान
अपने ही अंश युग के साक्षी
अनजान रास्ते आज हमारे अपने बने
चलते होत साथी मेरे
आशक्ति की हद आज पार कर ले
मानव कहलाने निमित्त ।
छगन लाल गर्ग ।