मंझे हाथ उभरते चित्र
बोलने लगते
स्थित सौंदर्य निहित रहता
लंबे अर्से तक बशर्ते संभाल रखे
अपनत्व देकर
नही चलता समय का राज
की शिथिल कर सके
लावण्य स्फटिक ऊर्जा का यौवन
वही निश्छलता
रंग रूप मादक आंगिक निखार
ओर नही होता भंग मोह
मेरे समय के थपेडे खाये शिथिल
जर्जर तन से चित्र का राग विरस
अनुभूति होती वही
अतीत की
जब साकार स्पंदन तन विलय थे
एक रस एक राग एक तन
आज कही विगत के गर्त मे
विलीन हुए तुम
पर वही चित्र बनता जाता मेरे हाथ
तुम्हारा
नही अब रूप बना पाता तुम्हारा
मुझ सा जर्जर
आज के लिए भी तुम वही उसी रूप
ओर मैं विस्मृत हुआ समय से
देखता हूँ अभी तक तुम्हारे चित्र मे
अपनत्व की जीवंतता
क्या सच हैं यह
मेरे विगत के राग कुछ कहो ।
छगन लाल गर्ग ।
बोलने लगते
स्थित सौंदर्य निहित रहता
लंबे अर्से तक बशर्ते संभाल रखे
अपनत्व देकर
नही चलता समय का राज
की शिथिल कर सके
लावण्य स्फटिक ऊर्जा का यौवन
वही निश्छलता
रंग रूप मादक आंगिक निखार
ओर नही होता भंग मोह
मेरे समय के थपेडे खाये शिथिल
जर्जर तन से चित्र का राग विरस
अनुभूति होती वही
अतीत की
जब साकार स्पंदन तन विलय थे
एक रस एक राग एक तन
आज कही विगत के गर्त मे
विलीन हुए तुम
पर वही चित्र बनता जाता मेरे हाथ
तुम्हारा
नही अब रूप बना पाता तुम्हारा
मुझ सा जर्जर
आज के लिए भी तुम वही उसी रूप
ओर मैं विस्मृत हुआ समय से
देखता हूँ अभी तक तुम्हारे चित्र मे
अपनत्व की जीवंतता
क्या सच हैं यह
मेरे विगत के राग कुछ कहो ।
छगन लाल गर्ग ।