Sunday, May 29, 2016

विराग राग


भर चुका अब भर चुका प्रेम प्याला रसमय होकर ।
हे अनंत सघन सुख को लगे न संचय की ठोकर ।।
उजाला हर पल रहता नहीं हैं अंधेरा हल्का सुराग पाता हैं ।
चुपके आते झौका बनकर गहन दारूण दुख देता हैं ।।
प्रकृति तेरा रूप बदलना सुख दुख का परिणाम हैं ।
पृथ्वी का विस्तार समझना मंथर मन का भटकाव हैं ।।
छूट सकता नहीं दुख जाल से हिल चूके हौसले मेरे दीवार से।
चित चूभा वार हुआ तलवार से पुख्ता नीव हिली शौर हुआ दिल से।।
कहा अनकहा रह गया हैं बड़ा अब लघु रह गया हैं ।
जल रहे दीये रोशनी नहीं हैं अंधेरा घना आँखे नहीं हैं ।।
चला बहुत अब थक गया हूँ तन जर्जर हौसला हारा हूँ ।
मार मिली घातक तडप गया हूँ बूँद लघु विलुप्त हुआ हूँ ।।
बोल सको तो अब मेरे जीवन बोलो
खोल सको तो अपनी पलके खोलो
डौलती धरा अब तुम भी कुछ डोलो
जीवन मे थोड़ा सा नेह अब घोलो ।
आशा निराशा की आँख मिचौली
धूप छांव खेले आँगन मेरे होली
रात दिवस की यह नित्य रैली
यह खेल विधि का अदभूत शैली ।
आज जीवन हैं कल कैसे कहूँ
कल आता भी हैं आज कैसे कहूँ
रात सी रात हैं उजाला कैसे कहूँ
आग सी आग हैं ठंडी कैसे कहूँ ।
क्षण हैं अभी तो मैं भी हूँ कण हैं अभी विस्तार  हूँ ।
पल हैं अभी चेतना भी हूँ जल हैं जलाशय भी हूँ ।।
पकडना पल चाहता हूँ सिमटना कल चाहता हूँ ।
लिपटना नेह चाहता हूँ बिखरना नहीं चाहता हूँ ।।
नव नीड नेह फिर बने भव भाव कोमल फिर बने।
जग खशनुमा हो फिर चले राग बंशी रस दायक बने।।
हो जाय जीवन कमनीय फिर खो जाय खार खेद छल फिर ।
सो जाये भोग नींद भरी फिर हो जाये अलौकिक मैल फिर ।।
ऋणदाता तेरा सदा रहेगा जख्म मेरा अब नहीं भरेगा।
माया मोह जाल नहीं बढ़ेगा हे ईश्वर तेरा आसरा रहेगा।।
हैं क्या ऐसा जिसमें तू नहीं दे क्या वेसा बनाया तूने नहीं ।
ले क्या वेसा बसेरा तेरा नहीं हे मालिक मेरे तू हैं कहां नहीं ।।
काश शब्द कुछ बोल पाते राज कुछ आज हल होते।
हास से भाव खुल जाते जाल जीवन छोड़ जाते ।।
बोले बिन क्या अंदाज लगाये रैन अंधेरी कौन दीप जलाये ।
नित पल रहे नैन कैसे भाये छोड़ चल दिये जीवन के छाये।।
किस लोक बसे मेरे प्राण क्या मुझे देना था त्राण ।
ढूँढा देव विफल हूँ करूण तुम मेरे चित कहां अरूण।।
जहां कहीं जन्म लो फिर नेह मेरे प्राण इस जन्म के जैसे।
रहे तेरे सत निर्मल झरने जैसे परहित तत्पर रहो पहले जैसे ।।
करूण घन घट मे छा गया हैं स्मृति तडाग प्रकाश आ गया हैं ।
विवश नयनों का बारिश हो गया हैं चित सरोवर पूरा भर गया हैं ।।
प्रवाह वेग अति प्रखर हो गया हैं प्राण पंखेरू उडान चाहते हैं ।
रूठे प्राण प्राण एकरसता चाहते महा मिलन प्राण पाना चाहते हैं ।।
रूक सकूँ यह हो सकता नहीं मोह बंध हो वेसी रज्जू नहीं ।
जुड़े तार तोडे जग काबिल नहीं नदी सागर मिले जीव सार यही ।।
ले चल मुझे हे बहते पानी धीरे धीरे कोमल राह राही ।
प्रेम सनी जहाँ छांव हो घनी विपदा जग न जले चिता ही।।
हर्ष उल्लास प्राण को घेरे निश्छल नेह निर्झर बहता रहे।
मन का भौरा कुसुम कुसुम पर नित नवरस पराग मद सोहे।।
भूल भूलैया जग माफी चाहता हूँ
भटकन से छूट जाना चाहता हूँ ।
पीर प्रेम छल से हताश हो गया हूँ
थक गया अब गहरी नींद चाहता हूँ ।।
चाह सारी शून्य हो गयी है ।
राह अब कोई शेष रही नहीं हैं ।
प्रेम विरल बन बह गया हैं ।
मरूस्थल सा तन रह गया हैं ।।