अभिलाषा जब होती युवा
बहुत मुश्किल होता संभाल रखना
ओर सारी हदें लगती पारदर्शी
होना दीवारों का बेबूझ विश्वास
ओर आस्था के पहिये फिसलते गति लेते
टकराने विशिष्ट करते स्वयं का होना
जादुई दुनिया का भ्रम लेता श्वासे
ओर स्थूल सत्य लगने लगता रतीभर
नहीं होती परवाह यथार्थ की
स्वप्नवत परछाईयों का शिखर
छूना चाहता मन निरंतर
ओर यही सब कुछ बिना पड़ताल
चलता जाता जीवन बेबूझपन
कहां हैं जिन्दगी
जिसे नाम दे सकूँ मेरा अपना
नहीं केवल एक अंतराल का सच
युगों का जीवन ओर चेतना बीच
ओर अभिलाषाओं की तृष्णा देती गति
अंतहीन निरूद्देश्य यात्रा निमित्त
जीवन केवल अज्ञान का अहंकार
जिसमें विलुप्त होना ही मकसद
ओर परिणाम वहीं दुर्गंध भरी देहिक मृत्यु
कास देह से अलग कोई अस्तित्व होता
सुगंध चेतन कुसुम सा
जहां बिखरेता अपना सौन्दर्य ।
छगन लाल गर्ग ।