Friday, May 13, 2016

पूर्ण मानव ।

हो चुका सक्षम
देने लगा राय अपनी
विद्वता का मद आ चुका
निखार पर
अब लगता हो चुका असाधारण
ओर जैसे ही अहसास की रंगत
होने लगती अंगीकृत
नही रह पाता मानव
बन जाता क्षमताओं का मालिक
ओर अहंकार चढ बोलता
भौपू की तरह
करता जाता सर्वश्रेष्ठता का दावा
होने लग जाते ख्यात भी
मेरे सामने खडे होते ही अज्ञानी
बडा अजीब हूँ मैं
उस दशा मे हो उठता संतप्त
जब अधिक क्षमतावान
दंभी घेरता मुझे
जीवन तब लगने लगता असार
ओर दमन करता जाता
भभकता क्रोध
जो जलाने लग जाता मुझे संपूर्ण
नही बचा पाता फिर
नरक तुल्य जीवन का अनुभव ही नही
नियमित भौक्ता बन चुका अब
बाहर सभ्रांत सुशील सज्जन
पर भीतरी आग जलता हुआ जाता
राख अब
चेतना का दीया जिले कैसे
भीतर के झंझावात बीच
ठहरो अगर बन सको प्राकृत
ओर यह ठहराव केवल सत्य देता
कि मानव जाति केवल एक प्रकृति
एक स्थूल एक सूक्ष्म
तुलनात्मक नही हो सकता मानव
ऊँची नीचे दीवारें केवल अहंकार की
तोडना होगा
यदि बनना चाहूँ पूर्ण मानव ।
छगन लाल गर्ग ।