जाना ही होगा
अनचाहे
बेरोजगार जो ठहरे
नही चलती हूकमत
बिना कमाये
अपनों पर
आजकल हर कार्य
लगता बेगारी घर की
नोकर सा अहसास होता
घर मे ही
लगता जाता करता मेरा
हर कोई शोषण
बेकार हुई जिन्दगी
यह क्षण
जीवन का अभिशाप बना
रात दिन
प्रतियोगी परीक्षाओं मे
संघर्ष ने छीन ली
आँखो की रोशनी
असफलताओं के काले धब्बे
अवरोधक बन उभरते
कालिमा लिए
मंजिल के रास्ते घने धूमिल
टिमटिमाते आशाओं के जुगनू
केवल
चुनावी घोषणापत्र में
बनते ही सरकार
फिर चलने लगती तभी
मतलबी बयार
लेन देन
ओर साहूकारों की
कर्ज चुकाई
रास्ते नही खुले
आजतक
इन्तजारी में गुजरती
कमाऊ उम्र
मत देना दोष हमे
कहाँ हमारा
आज अस्तित्व
जवानी छीन ली
व्यवस्था ने
कास प्रजातंत्र का
हिस्सा
हमें भी मिलता
आजाद भारत में ।
छगन लाल गर्ग ।
अनचाहे
बेरोजगार जो ठहरे
नही चलती हूकमत
बिना कमाये
अपनों पर
आजकल हर कार्य
लगता बेगारी घर की
नोकर सा अहसास होता
घर मे ही
लगता जाता करता मेरा
हर कोई शोषण
बेकार हुई जिन्दगी
यह क्षण
जीवन का अभिशाप बना
रात दिन
प्रतियोगी परीक्षाओं मे
संघर्ष ने छीन ली
आँखो की रोशनी
असफलताओं के काले धब्बे
अवरोधक बन उभरते
कालिमा लिए
मंजिल के रास्ते घने धूमिल
टिमटिमाते आशाओं के जुगनू
केवल
चुनावी घोषणापत्र में
बनते ही सरकार
फिर चलने लगती तभी
मतलबी बयार
लेन देन
ओर साहूकारों की
कर्ज चुकाई
रास्ते नही खुले
आजतक
इन्तजारी में गुजरती
कमाऊ उम्र
मत देना दोष हमे
कहाँ हमारा
आज अस्तित्व
जवानी छीन ली
व्यवस्था ने
कास प्रजातंत्र का
हिस्सा
हमें भी मिलता
आजाद भारत में ।
छगन लाल गर्ग ।