Wednesday, May 18, 2016

अबोध राग


अबोध राग
बादलों के नीर सा हृदय पीर तेरी भर चुका
घायलों के से पीर की तडप चित अब झूका
बौझ उठा सके नहीं आसरा किसी ढाल का
सहृदय देंगे संबल नहीं भरोसा स्वजनों का।
लग चुकी हैं जिन्दगी को हाय किसी की
बन चुकी हैं भावना भी जलती आग की
मिले हैं जख्म ऐसे जुबान कहने से रूकी
खिले उपवन मे आँधी विनास की टपकी।
संतोष होता हैं केवल शब्दों से
शब्द होते नहीं सार्थक तोल से
तोलते टोह से नहीं होते भाव से
मुरझे दिल खिले आत्म भाव से।
घरौदा ही होता तो हमें शुकून मिलता
जाने कब से इंतजार कोई मेरा करता
बेवफा ही मिलता वफा करना सिखता
कसक देता दिल मे विरह राग तो होता ।
नहीं जानता चाह जीवन क्यों जुड़ी हैं
चाह रखे दिल को क्या सुखी सुना हैं
सुख ओर चाह जैसे रात ओर दिन हैं
नहीं सुना दुनिया से कभी रहे साथ हैं ।
जब भी मन अस्थिर होता
विवेक दृढ़ हो समझा देता
कारण रहा हैं कुछ कहता
उपेक्षा मेरी हुई हैं कहता।
काम बहुत हैं करें हम कैसे
नाम निरंतर कहें पर वैसे
होते नहीं हैं कर सके जैसे
तभी चित होता कुंठित ऐसे।
चल अकेले चल राही
पीछे आगे नहीं मोही
साथी नहीं हैं हमराही
तेरे बन चुके निर्मोही।
काल कठिन तू घिर चुका हैं
जाल गुंफित घेरे मे घिरा हैं
तडप रे मनवा तोड़ नहीं हैं
बस सके कोई राह नहीं हैं ।
छोड़ तू आशा मिलना नहीं हैं
मिले हुए का स्मरण बसा हैं
चित घोल उसमें सत्य वही हैं
भावी मिलन की आस नहीं हैं ।
जायेंगे कब हम किसको पता हैं
आज का भी विश्वास किसे हैं
पल स्पंदन अभी चलता लगे हैं
तत्काल का हमें विश्वास नहीं हैं ।
तैश मे आकर दांव वर्चस्व लगाते
वर्चस्व जिसे अस्तित्व हीन पाते
अहं का पुतला कोरा जीवन पाते
सत्य भूमा का विवेक नहीं रखते ।
आन बान से झूठा जीवन लिपटा हैं
ऐंठ तना तन मन ढकोसला बना हैं
मन भर रही अतृप्ति सार जीवन हैं
उठा पटक का दांव चलता घना हैं ।
परवाह ओरो की रहती कब हैं
पराये अपने हमसे रहे दुखी हैं
विस्तार सुख हमारा अपना हैं
निर्बल दुख भार लिए मरते हैं ।
कोई मेरा होता सुख रचना करता
दुख जाते तो हमे अहसास आता
मिलता नहीं हमारा हर्ष आ पाता
करें पलक बंद घनी छाया पाता।
आदमी आज का चाहे जो समझ लेता हैं
आदमी आज का चाहे जैसा कर लेता हैं
शक्कर सा मीठापन विष पर चढाता हैं
धोखा दे विरोधी को मीठा विष देता हैं ।
स्वप्न क्या हैं अतृप्त वासना हैं
दबाया वहीं सपने मे उभरता हैं
दिखा सपना झूठ नहीं होता हैं
संकेत अपने ही संबंध मे देता हैं ।
अतिविद्धवता मे प्रबुद्ध आज मानव जीता हैं
भावना सहृदयता सबको कमजोरीमानता हैं
कठोर धरातल उसका मानवप्रेम रहा नहीं हैं
विवादों से जीता करता चित का खंडन हैं ।
अक्सर मुझे लगने लगा हैं मैं जेल खाने मे बंद हूँ
सुख सुविधा भोगता घर रूपांतरण जेल बना हूँ
देह सावधानी चाहे कृशता हावी परतंत्र हुआ हूँ
वृद्ध पड़ाव आया मेरा यही मंजिल समझ बैठा हूँ ।
प्रभु मेरे चित तल्लिनता तुझमे मेरी गहरी हो जाये
चाहूँगा मेरा तन मन डूबे तुझमे ही फिर शून्य हो जाये
तुम चित चीर लो मेरा रोशन किरणें तेरी बिखर आये
मैं कहीं बाकी रहे नहीं मेरा केवल तू ही तू छा जाये ।
काम वासना से जो भी बना वह तो मृत्यु मरेगा ही
हे आत्म तत्व तुम बने कहां जन्म पूर्व भी थे रहोगे ही
प्रतीती तेरी क्या हो सकेगी शास्त्र अध्ययन करते ही
जागता वो ही पहचान लेता शास्त्र मे भटके रहते नहीं ।
खोज करना चाहे खोज चेहरा जो तेरा असली था
जन्म पूर्व जो था चेहरा वहीं चेहरा तो असली था
मृत्युपरांत जो पायेगा वहीं जो जन्म पूर्व तेरा था
जन्म मृत्यु बीच धारित चेहरा केवल उधार का था।
हम तो सदा रोते ही रहते हैं
अतीत छूट गया तो रोते हैं
आसपास कोई अपना रोते हैं
चाहा नहीं पा सके तो रोते हैं ।
सहज व्यक्ति पहचान मे रहता कहां हैं
पहचान रखता नहीं वहीं तो साधु हैं
अस्तित्व रहे हमारा इसी से असहज हैं
दिशा जीवन की पहचान ही प्रयास हैं ।
सहारा जब तक मिलता मन विद्यमान हैं
बिना सहारे मन कभी रह सकता नहीं हैं
एक सहारा टूटे तो अन्य सहारा लेता हैं
आत्मा किसी का सहारा लेती नहीं हैं ।
अच्छे व्यक्ति के जीवन नमक नहीं होता हैं
नमक बिना के जीवन मे स्वाद कहां आता हैं
बुरे व्यक्ति के जीवन मे नमक बहुत होता हैं
वह नमक सी तेजी ओर गरिमा से जीता हैं ।
जितने अपने काम हम करते
जिम्मेदार उतने ही हम रहते
मैं कर्ता हूँ मन के भाव रहते
चौक्कने रहकर क्रियाऐं करते ।
भावना ऐसी जब रहती नहीं हैं
क्रिया मे शिथिलता रहती जाती हैं
होनी भरोसे छोड निष्क्रिय होते हैं
आलस्य विश्रान्त होकर जीते हैं ।
खोल दे मेरे चित कपाट अपने
बंद चित घने दर्द लगेगा फटने
अंबार दुख बादल लगा गरजने
आँधी घनी बरसात लगे बरसने।
आँख दिल बीच राह अभी सूनी पड़ी हैं
रहम कर चित जीने की ललक घनी हैं
हार चुका प्राण देह त्यागना चाहता हैं
आशा भरी नयन पीर नीर बहे चाह हैं ।
मन घायल हैं तन घायल
कर्म लायक वक्त बेडौल
गीत सुने दर्द से कायल
दीपक अरमान हैं हिलडूल।