भूलता नहीं
अधिकार निहित व्यक्तित्व
चाहता कि न रहूँ
पूर्ववत
होना होगा वर्तमान की तरह
निहत्था लाचार विवश
समय की नौक से लुढके
अतिरेक चले तीर की तरह
करना होगा स्वयं को निर्रथक
बेकाम बेअर्थ बेनाम
उम्र की दीर्घता
दुर्गंध भरी
करती रहती दूषित जलवायु
जहाँ मुश्किल होता
युवाओं को मुक्त श्वास लेना
नहीं हो पाता चाहा
घनी बंदीस उतर जाती भीतर
तौडती रहती अस्तित्व
होता रहता जर्जर इसी मार
शायद सही राह यहीं
गुजरे जमाने की
होता रहे नव चेतन की चौट जर्जर
यही टूटन की तलवार
व्यक्तित्व पर निरंतर होने दो वार
असंख्य
नहीं आवश्यकता भूलने की अधिकार
व्यक्तित्व टूटन मे खंडित हुए
अदृश्य विलय होते शून्य ।
छगन लाल गर्ग ।