Friday, April 1, 2016

हताशा ।


लौटा हताशा ओर उदासी लिए
आमंत्रण पाया कर्तव्य
नहीं रहता याद कई बार
अपना वजनी अहंकार नहीं करता
ऐसा कोई आमंत्रण स्वीकार
इस बार थोड़ा समझाया करा खुद को
ओर तब गया
रिटायरमेंट की पार्टी
नहीं पता था वहाँ गंवाना पडेगा
स्वाभिमान खुद को छिपाकर
करोड़पति रईस नवसृजित नही रहे
मेरी जानकारी
ओर कर बेठा हमतौल अपने से
शिक्षित समझदार ओर सुसंस्कृत भरोसे
नहीं रख पाया ख्याल
अपनी माली यशस्वी औकात का
जो मात्र उपहास का विकल्प
आवरण रहता मात्र
नैतिक शैक्षिक वाचिक केवल पर्दे
असलियत धन वैभव का मद ढकते
ओर यही विखण्डित हुआ अपमानित
स्मृति पल लिए लौटा हूँ घर
स्वाभिमान अर्पित कर कैसे जीया जाता
अब सीखना होगा जीना
अन्यथा स्वप्नवत ही होगा रहा बाकी ।
छगन लाल गर्ग ।