Saturday, April 2, 2016

समय सुख।


बाढ़ सा उमडा
स्नेह का निर्झर
यह करिश्मा कुदरती
लेना देना
खुशियाँ का खजाना
असोचा असंभित करता
नहीं होता विश्वास
मेरे स्वयं का
वहीं तो हूँ ना या कोई ओर
बडा शून्य चेतन सा
बन गया आज
नहीं हुआ पहले ऐसा कभी
ओर ना कभी कल्पना मे आभास
कि होगा जीवन
उजडने के बाद आबाद
हाँ नहीं होता ऐसा
दुखियो के जीवन
मात्र रोने के अतिरिक्त कुछ भी
पर हुआ तो
पुत्र बन आये ओर गये
अब विराने मे सडता अस्तित्व
फिर एक बार
घीरा उम्मीदों की दुनिया
कैसे करू स्वागत
अंबार खुशियों का
उन्मुक्त तन मन
पोते के रूप मे वापसी हुई
मेरे स्वर्गीय पुत्र विनोद बन
बड़ा वैभवमय हृदयवान ईश्वरीय
समय का पैकेज
मेरे लिए मुग्ध मन मर्मज्ञ ममता भरा ।
छगन लाल गर्ग ।