Saturday, April 2, 2016

यांत्रिक कदम ।


बढ़ते नहीं कदम
हो चुके अनुपयोगी
समय की करवट तले
व्यतीत हुआ
ऊर्जा रस सौखता रहा
धरातल
मिट्टी की उर्वरा निरंतर
काम आती रही
जड पदार्थो के सौन्दर्य संवर्धन
ओर प्राण चेतना
तरसती रही स्वयं के रस
अमूर्त निर्रथकता का सत्य
आज का सत्य
ओर कदमों का आधार
सरकता जाता
नहीं रही जमीन कि बढ सके
आम कदम
भयभीत हूँ रफ्तार दौडती भीड़ से
नहीं मुकाबला बराबरी का
रीता हुआ ऊर्जा स्त्रोत स्पंदन
मंथर अवरुद्ध गति
चेतन मूर्तता पाने आतुर
जडता से
ओर संसर्ग जडता देती जड़भूमि
चेतन को
अब नहीं पाते प्राण चेतन की संवेदना
जड हो चुका आकार तत्व
केवल यांत्रिक गति बना चुका
कदमों का बढना
प्राणों की पीर कुंठित हुई
ओर मानव अर्थ देना
इस युग असभ्यता की पहचान
नहीं चाहता
रोक देता हूँ बढते कदम
बिना धरातल कथित असभ्यता
ओर होने लगता पहले
तार्किक जडपारखी सभ्य
आओ मिलकर करे नव निर्माण
संवेदनशून्य यांत्रिक भव का
सभ्य मनु बनकर ।
छगन लाल गर्ग ।