Monday, June 13, 2016

लालिमा

आह यह लालिमा
प्राची तल घेरती ललक जगाती
गैरूऑ तन वयसंधि काल लुभाती
हृदय रमाये लगे सुहानी
वाह रे अरूण तन के सौन्दर्य 
मन मदमाता तन इठलायै
खग कलरव नहीं 
राग अनुप लिऐ सौन्दर्य ही गाता
आत्म मुग्ध हो गीत अंकुर के 
फूट फूट रश्मि अंकुरित सौन्दर्य तेरी
खुले गगन मे अंगडाई लेती
मादक मादक महीन मुस्कान सी
गंधमयी खुशबू समेटे फैल फैल जाती
रे।सौन्दर्य मिटा मिटा हूँ 
निहारू तुझे मैं हृदय संभाले
सौन्दर्य नहायी बदरी देखो
रश्मि कर कोमल पकडे हाथों 
चुनर बनाये औढे तू अब कर तिरसे नयनो
वाह बाल यौवन की उषा सुंदरी
सारे जहाँ मे नवल महकती सौरभ बिखराती
उषा रानी
चित पुकार अब उठ उठ जाती
हे।मेरे सृजक कृति अलौकिक 
अति मनरंजित मोहक सुरभित
तरंग सौन्दर्य यौवन
तूने बनाया 
नहीं रे सामर्थ्य मुझमें 
दी कब तुमने करू चित भरने
सौन्दर्य जग दाता तेरी 
मेरे चित भरने।
छगन लाल गर्ग।


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