कदम बढते रूकते हैं
अनुभव ऐसा पहले का न था
बढ़ता हूँ भीड़ की तरफ
पर बाहर बाहर का घेरा विशाल भीड़
भीतर पहुँच का कहीं सुराख नहीं
पूछता हूँ जबाव नहीं पाता
एक तरफ हो लेता हूँ
छाया का दान पाता हूँ नीम का
वहीं पत्थर का छोटा चबूतरा हैं
बैठता उसके तल पर
अच्छा लगता हैं ऐसे बैठना
भाता हैं मेरी औकात से मेल खाता हैं
अपनी तह से वाकिफ हूँ मैं
नजरें उठाये देखता भीड़ की ओर
हाँ अब छंटती लगती हैं
शायद जानकारी देने की शिष्टता कोई करें
निश्वास लिए उठता हूँ
देखता झुके कंधे लाठी का सहारा लिए बुजुर्ग
मेरी ओर आते कहते हैं
इकलोता पुत्र विष पी गया
बेचारा करे भी क्या
बारह वर्षो से बेरोजगार
खेत खलियान पढ़ाई मे बिके
रहा सहा नित नये वेकेन्सी ओर टेस्ट परीक्षा मे पूरा हुआ
अब रास्ता दूसरा था कहां
जहर के शिवाय
देखता हूँ बुजुर्ग की ऑखो की तरलता मे
मेरा अस्तित्व विलिन होता समाता सा।
छगन लाल गर्ग।
अनुभव ऐसा पहले का न था
बढ़ता हूँ भीड़ की तरफ
पर बाहर बाहर का घेरा विशाल भीड़
भीतर पहुँच का कहीं सुराख नहीं
पूछता हूँ जबाव नहीं पाता
एक तरफ हो लेता हूँ
छाया का दान पाता हूँ नीम का
वहीं पत्थर का छोटा चबूतरा हैं
बैठता उसके तल पर
अच्छा लगता हैं ऐसे बैठना
भाता हैं मेरी औकात से मेल खाता हैं
अपनी तह से वाकिफ हूँ मैं
नजरें उठाये देखता भीड़ की ओर
हाँ अब छंटती लगती हैं
शायद जानकारी देने की शिष्टता कोई करें
निश्वास लिए उठता हूँ
देखता झुके कंधे लाठी का सहारा लिए बुजुर्ग
मेरी ओर आते कहते हैं
इकलोता पुत्र विष पी गया
बेचारा करे भी क्या
बारह वर्षो से बेरोजगार
खेत खलियान पढ़ाई मे बिके
रहा सहा नित नये वेकेन्सी ओर टेस्ट परीक्षा मे पूरा हुआ
अब रास्ता दूसरा था कहां
जहर के शिवाय
देखता हूँ बुजुर्ग की ऑखो की तरलता मे
मेरा अस्तित्व विलिन होता समाता सा।
छगन लाल गर्ग।