Monday, June 13, 2016

कदम बढते रूकते

कदम बढते रूकते हैं 
अनुभव ऐसा पहले का था
बढ़ता हूँ भीड़ की तरफ
पर बाहर बाहर का घेरा विशाल भीड़ 
भीतर पहुँच का कहीं सुराख नहीं 
पूछता हूँ जबाव नहीं पाता
एक तरफ हो लेता हूँ 
छाया का दान पाता हूँ नीम का
वहीं पत्थर का छोटा चबूतरा हैं 
बैठता उसके तल पर
अच्छा लगता हैं ऐसे बैठना
भाता हैं मेरी औकात से मेल खाता हैं 
अपनी तह से वाकिफ हूँ मैं 
नजरें उठाये देखता भीड़ की ओर
हाँ अब छंटती लगती हैं 
शायद जानकारी देने की शिष्टता कोई करें 
निश्वास लिए उठता हूँ 
देखता झुके कंधे लाठी का सहारा लिए बुजुर्ग 
मेरी ओर आते कहते हैं 
इकलोता पुत्र विष पी गया
बेचारा करे भी क्या 
बारह वर्षो से बेरोजगार 
खेत खलियान पढ़ाई मे बिके
रहा सहा नित नये वेकेन्सी ओर टेस्ट परीक्षा मे पूरा हुआ 
अब रास्ता दूसरा था कहां 
जहर के शिवाय
देखता हूँ बुजुर्ग की ऑखो की तरलता मे
मेरा अस्तित्व विलिन होता समाता सा।
छगन लाल गर्ग।