क्या हो उन्माद
का
कहां देखता कि काल की रमणीय हिलोरे
लुभाये नित नया अंदाज लेकर
विभ्रान्त हुआ यह तन मन एकाग्र हुआ
डूब जाना चाहता अंत के विवर मे
उन्माद अस्तित्व अतिशय बहुरंगी तंरगो से खेलता
रसागार का अंश समर्पित हुआ सा अस्तित्व
क्या करू तेरा शिथिल लाचार मोहित तुझमे
मेरे उन्माद रूको
जीवन यही तो हैं नहीं
कुछ ओर भी जो अभी अनछुआ
अनभोगा अनपाया बेबूझ
ऊर्जा स्त्रोत दिशा तो बदले देखे
जिन्दगी के सतरंगी रूप
इठलाती मदमाती जिन्दगी की नजाकत
महीन स्वपनिल ताने बाने से बुने
अमूर्त गंध देते बिम्ब
कि जहाँ एक पल का ठहराव बनती अनमोल धरोहर
सपने लेते आकार
प्रेम होता पावन कंचन बना तपा तपाया
स्वर नहीं राग होता
गीत नहीं गति होती
जीवन नहीं विलय होता
प्रार्थना प्रेम विलय पाते
रहता केवल रस महा शून्य मे समाया सा
जिसके शब्द खो गये हैं """""।
छगन लाल गर्ग।
कहां देखता कि काल की रमणीय हिलोरे
लुभाये नित नया अंदाज लेकर
विभ्रान्त हुआ यह तन मन एकाग्र हुआ
डूब जाना चाहता अंत के विवर मे
उन्माद अस्तित्व अतिशय बहुरंगी तंरगो से खेलता
रसागार का अंश समर्पित हुआ सा अस्तित्व
क्या करू तेरा शिथिल लाचार मोहित तुझमे
मेरे उन्माद रूको
जीवन यही तो हैं नहीं
कुछ ओर भी जो अभी अनछुआ
अनभोगा अनपाया बेबूझ
ऊर्जा स्त्रोत दिशा तो बदले देखे
जिन्दगी के सतरंगी रूप
इठलाती मदमाती जिन्दगी की नजाकत
महीन स्वपनिल ताने बाने से बुने
अमूर्त गंध देते बिम्ब
कि जहाँ एक पल का ठहराव बनती अनमोल धरोहर
सपने लेते आकार
प्रेम होता पावन कंचन बना तपा तपाया
स्वर नहीं राग होता
गीत नहीं गति होती
जीवन नहीं विलय होता
प्रार्थना प्रेम विलय पाते
रहता केवल रस महा शून्य मे समाया सा
जिसके शब्द खो गये हैं """""।
छगन लाल गर्ग।