Monday, June 13, 2016

शब्द खो गये

क्या हो उन्माद का
कहां देखता कि काल की रमणीय हिलोरे
लुभाये नित नया अंदाज लेकर
विभ्रान्त हुआ यह तन मन एकाग्र हुआ 
डूब जाना चाहता अंत के विवर मे
उन्माद अस्तित्व अतिशय बहुरंगी तंरगो से खेलता
रसागार का अंश समर्पित हुआ सा अस्तित्व 
क्या करू तेरा शिथिल लाचार मोहित तुझमे
मेरे उन्माद रूको
जीवन यही तो हैं नहीं 
कुछ ओर भी जो अभी अनछुआ 
अनभोगा अनपाया बेबूझ
ऊर्जा स्त्रोत दिशा तो बदले देखे
जिन्दगी के सतरंगी रूप 
इठलाती मदमाती जिन्दगी की नजाकत
महीन स्वपनिल ताने बाने से बुने
अमूर्त गंध देते बिम्ब
कि जहाँ एक पल का ठहराव बनती अनमोल धरोहर 
सपने लेते आकार 
प्रेम होता पावन कंचन बना तपा तपाया
स्वर नहीं राग होता 
गीत नहीं गति होती
जीवन नहीं विलय होता 
प्रार्थना प्रेम विलय पाते 
रहता केवल रस महा शून्य मे समाया सा
जिसके शब्द खो गये हैं """""
छगन लाल गर्ग।