सुनोगे अगर विनय करू
शब्दों का मिजाज शिथिल करता
शायद सहायक बने अभिव्यक्ति दे पाये
दुनिया आदी नहीं प्रार्थना विनती की
पर कहीं कहीं बिखरे बिखरे अवशेष घनी धूप के आदी
अभी शिथिल श्वास लिए झुलसते से
जीने का अभ्यास प्रतिपल करते हैं
महसूसते हैं मानव का दिल
खंडित टूटा भग्नावेश ही सही धडकता मिले
जिसमें संवेदना का अंश छूऐ उनका अस्तित्व
ठसक लेता थाह पाता परिवर्तित हो मानव सा
घनीभूत सपनों के वाहक हृदय
तू क्या कम हैं कि नित बसाता
हृदय अपने अरमानो का गुलदस्ता
केवल मोहक पुष्पो का दल
ठहर कभी
खंडित मुरझाये पर हैं वही जो आज की महक के
साक्षी बने हैं कभी
क्या सिखेगा कुछ एकलय अनुभूति लेगा
जिद्ध कहां हैं मेरी केवल विनती
बोलो
सुनोगे अगर विनय करू।
छगन लाल गर्ग।
शब्दों का मिजाज शिथिल करता
शायद सहायक बने अभिव्यक्ति दे पाये
दुनिया आदी नहीं प्रार्थना विनती की
पर कहीं कहीं बिखरे बिखरे अवशेष घनी धूप के आदी
अभी शिथिल श्वास लिए झुलसते से
जीने का अभ्यास प्रतिपल करते हैं
महसूसते हैं मानव का दिल
खंडित टूटा भग्नावेश ही सही धडकता मिले
जिसमें संवेदना का अंश छूऐ उनका अस्तित्व
ठसक लेता थाह पाता परिवर्तित हो मानव सा
घनीभूत सपनों के वाहक हृदय
तू क्या कम हैं कि नित बसाता
हृदय अपने अरमानो का गुलदस्ता
केवल मोहक पुष्पो का दल
ठहर कभी
खंडित मुरझाये पर हैं वही जो आज की महक के
साक्षी बने हैं कभी
क्या सिखेगा कुछ एकलय अनुभूति लेगा
जिद्ध कहां हैं मेरी केवल विनती
बोलो
सुनोगे अगर विनय करू।
छगन लाल गर्ग।