वक्त की करवट संग
चिंतन ही नहीं उपयोगिता भी
करवट बदलती हैं
चम्पा का घना छायेदार वृक्ष नहीं रहा
गिरते पीले पत्तों की छाया से वंचित छितरी दम तौडती
छाया का मोहताज बना बैठा हूँ
भला लगता हैं मौसम का यह रूप उसका करवट लेना
जाडे मे हल्की तपन का आभारी हूँ मैं
सुहाता हैं
दोनों का अस्तित्व मेरा अस्तित्व बना हैं
सोचना बाकी रह गया केवल
साम्य जीवन जीने का उपाय
टूटी टहनियो का दर्द टूटे पत्तों का दर्द
समर्पित जीए ओरो के
अब इन्हें गंदगी कहना सभ्यता हैं
वक्त की मार पाये त्रासदी झेलो का अंजाम
जीवन तेरी परीक्षा हैं यह
जिसमें हरेक को प्रवेश पाना हैं
वक्त की करवट का यह सत्य अछूआ कैसे करोगे
चिंतन करता हूँ प्रत्यक्ष पाता हूँ ।
छगन लाल गर्ग।
चिंतन ही नहीं उपयोगिता भी
करवट बदलती हैं
चम्पा का घना छायेदार वृक्ष नहीं रहा
गिरते पीले पत्तों की छाया से वंचित छितरी दम तौडती
छाया का मोहताज बना बैठा हूँ
भला लगता हैं मौसम का यह रूप उसका करवट लेना
जाडे मे हल्की तपन का आभारी हूँ मैं
सुहाता हैं
दोनों का अस्तित्व मेरा अस्तित्व बना हैं
सोचना बाकी रह गया केवल
साम्य जीवन जीने का उपाय
टूटी टहनियो का दर्द टूटे पत्तों का दर्द
समर्पित जीए ओरो के
अब इन्हें गंदगी कहना सभ्यता हैं
वक्त की मार पाये त्रासदी झेलो का अंजाम
जीवन तेरी परीक्षा हैं यह
जिसमें हरेक को प्रवेश पाना हैं
वक्त की करवट का यह सत्य अछूआ कैसे करोगे
चिंतन करता हूँ प्रत्यक्ष पाता हूँ ।
छगन लाल गर्ग।