Monday, June 13, 2016

वक्त की करवट

वक्त की करवट संग
चिंतन ही नहीं उपयोगिता भी
करवट बदलती हैं 
चम्पा का घना छायेदार वृक्ष नहीं रहा
गिरते पीले पत्तों की छाया से वंचित छितरी दम तौडती
छाया का मोहताज बना बैठा हूँ 
भला लगता हैं मौसम का यह रूप उसका करवट लेना
जाडे मे हल्की तपन का आभारी हूँ मैं 
सुहाता हैं 
दोनों का अस्तित्व मेरा अस्तित्व बना हैं 
सोचना बाकी रह गया केवल 
साम्य जीवन जीने का उपाय 
टूटी टहनियो का दर्द टूटे पत्तों का दर्द 
समर्पित जीए ओरो के
अब इन्हें गंदगी कहना सभ्यता हैं 
वक्त की मार पाये त्रासदी झेलो का अंजाम 
जीवन तेरी परीक्षा हैं यह
जिसमें हरेक को प्रवेश पाना हैं 
वक्त की करवट का यह सत्य अछूआ कैसे करोगे
चिंतन करता हूँ प्रत्यक्ष पाता हूँ
छगन लाल गर्ग।