आवाज उभरी हैं अन्तर की चेतना
भटकते प्रश्न पालती हैं
जो निरूतर भटकते घने विवर
हर चित टकराये ओर जख्मी हुए हैं
सार हीन धूमिल अंधेरो की परत परत मे दबे थके
चेतना थकी पर मिटी कहां
रह रह उभरते विकल करते
यह देह ओर चेतन प्राण का दिखता बिम्ब
चलायमान गति मान भरता फूलता अस्तित्व व्यक्तित्व
कि मैं हूँ एक दृढ़ता कि मेरा हैं
यह तन यह मन यह जीवन सब मुझमे अन्तर्लीन
होता हुआ जीता हूँ मैं
यह जीना मेरा तब भार बनता
जब प्रश्न उठता वहीं
जो हैं अभी निरूतर असीम हुआ सा
कि मेरा सब कुछ कहना मेरे सम्पूर्ण अस्तित्व सहित
क्या कभी रहा मेरा मेरी सामर्थ्य तले जीना
रहा हैं रहेगा
प्रश्न जटिल नही पर विवेक हमारा बहुत जटिल
चाह का अतिरंजन सुख जोहता यह जीवन
जानता बूझता पर मानता कहां
घनेरे जज्बातो बीच दब दब जाता सत्य
अंधेरे के घने विवर मे फिर फिर भटकने को आतुर
यह मन यह देह ओर अनगिनत सपनो का
अंतहीन रंगीन जज्बा
क्या हो इसका प्रश्न केवल यही यही
जो हैं अनुतरित
जिसका उतर जानते भी
देना नहीं चाहते हम
विवशता हमारी।
छगन लाल गर्ग।
भटकते प्रश्न पालती हैं
जो निरूतर भटकते घने विवर
हर चित टकराये ओर जख्मी हुए हैं
सार हीन धूमिल अंधेरो की परत परत मे दबे थके
चेतना थकी पर मिटी कहां
रह रह उभरते विकल करते
यह देह ओर चेतन प्राण का दिखता बिम्ब
चलायमान गति मान भरता फूलता अस्तित्व व्यक्तित्व
कि मैं हूँ एक दृढ़ता कि मेरा हैं
यह तन यह मन यह जीवन सब मुझमे अन्तर्लीन
होता हुआ जीता हूँ मैं
यह जीना मेरा तब भार बनता
जब प्रश्न उठता वहीं
जो हैं अभी निरूतर असीम हुआ सा
कि मेरा सब कुछ कहना मेरे सम्पूर्ण अस्तित्व सहित
क्या कभी रहा मेरा मेरी सामर्थ्य तले जीना
रहा हैं रहेगा
प्रश्न जटिल नही पर विवेक हमारा बहुत जटिल
चाह का अतिरंजन सुख जोहता यह जीवन
जानता बूझता पर मानता कहां
घनेरे जज्बातो बीच दब दब जाता सत्य
अंधेरे के घने विवर मे फिर फिर भटकने को आतुर
यह मन यह देह ओर अनगिनत सपनो का
अंतहीन रंगीन जज्बा
क्या हो इसका प्रश्न केवल यही यही
जो हैं अनुतरित
जिसका उतर जानते भी
देना नहीं चाहते हम
विवशता हमारी।
छगन लाल गर्ग।