Monday, June 13, 2016

अन्तर की चेतना

आवाज उभरी हैं अन्तर की चेतना
भटकते प्रश्न पालती हैं 
जो निरूतर भटकते घने विवर
हर चित टकराये ओर जख्मी हुए हैं 
सार हीन धूमिल अंधेरो की परत परत मे दबे थके
चेतना थकी पर मिटी कहां 
रह रह उभरते विकल करते 
यह देह ओर चेतन प्राण का दिखता बिम्ब
चलायमान गति मान भरता फूलता अस्तित्व व्यक्तित्व
कि मैं हूँ एक दृढ़ता कि मेरा हैं 
यह तन यह मन यह जीवन सब मुझमे अन्तर्लीन
होता हुआ जीता हूँ मैं 
यह जीना मेरा तब भार बनता 
जब प्रश्न उठता वहीं 
जो हैं अभी निरूतर असीम हुआ सा
कि मेरा सब कुछ कहना मेरे सम्पूर्ण अस्तित्व सहित
क्या कभी रहा मेरा मेरी सामर्थ्य तले जीना
रहा हैं रहेगा 
प्रश्न जटिल नही पर विवेक हमारा बहुत जटिल 
चाह का अतिरंजन सुख जोहता यह जीवन 
जानता बूझता पर मानता कहां 
घनेरे जज्बातो बीच दब दब जाता सत्य 
अंधेरे के घने विवर मे फिर फिर भटकने को आतुर 
यह मन यह देह ओर अनगिनत सपनो का
अंतहीन रंगीन जज्बा
क्या हो इसका प्रश्न केवल यही यही 
जो हैं अनुतरित 
जिसका उतर जानते भी
देना नहीं चाहते हम 
विवशता हमारी।
छगन लाल गर्ग।