Monday, June 13, 2016

सोने दो उन्हें

अब सोने दो उन्हें 
शिथिल रूग्ण तन घना
फिर चौट भी मस्तिष्क खाया हैं 
प्राण रोते होंगे 
टकटकी बान्धे भीतर से निहारने दो
यह रूदन अदृश्य प्रकृति बीच 
कि हवा सी रश्मिया अचेतन घेरती हैं 
घिर घिर घना हो जाने दो
भ्रम का अंबार भावों से भीगा हमारा
पलिक संवेदना के राग नहीं स्वीकार होंगे 
इन्हें अपने भीतर के पावन भावों से निखर जाने दो
निखरे निखरे भाव भीतर की आद्रता हैं 
यह दरिया भीतर ही रहने दो
मानव के अस्तित्व का यह दीया
अपनी शिथिल रोशनी टिमटिमाने दो
अस्तित्व का यह दृश्य विकार हीन पावन रूप लिए
खुली ऑखो से निकलने दो
देखो दृश्य थोड़ा आत्मसात लिए जियो
जीवन नद का अंतिम मुहाना 
आत्मा खटके तो खटकने दो
चाह भरी जिन्दगी दुनिया जीए अछूती जीए
जीने दो
अब प्रार्थना के स्वर 
प्रातः सौन्दर्य के ध्वनि राग नही 
सामर्थ्य सीमा सोती हैं सोने दो
जीवन यात्रा के दोषों का प्रतिकार मत कहो
ईश्वरीय गणित हैं यह
मस्तिष्क अवगुण्ठित भंवर हुआ 
व्याख्या रहने दो
भीतर राग रूदन उफना ही मेरा राग हैं 
चेतना मेरी पनपी इसी मे हैं 
यह चेतन राग बहने दो
मौन मुखर एकाग्र बना मन महाविलय लीन हैं 
प्रार्थना के भीतरी राग निश्छल चेतन करो
दुऑओ का भीतरी अदृश्य काफिला 
अदृश्य शक्ति संग सरकने दो।
छगन लाल गर्ग।