क्यों होता हैं
अंधकार का कालापन
क्या यह झलक हैं
रोशनी का अस्तित्व मिट जाय
खुली ऑखो को चुनौती नहीं
रोशनी की व्यर्थता साबित हो
ठीक हैं माना कि
हमारे प्रयास उपकरणों का अवलंबन लेकर
मिटाते हैं ऑखो की अंतिम पहुँच तक का अंधेरा
पर क्या काफी नहीं
साबित होता ही जाता
अंधेरे का अस्तित्व
स्वीकार करना ही होगा
अमिट हैं अंधेरा
नही उपाय कि रोको
उपाय होता भी हैं
पर मनुष्य के हाथों नही
समय आने पर सूर्य से
सूर्य भी समय से पहले
कहां मिटा पाता अंधेरा
स्वीकारना ही होगा
यह अंधेरा
ठीक वैसे ही
प्रकृति का अंधकार
हमारी जिन्दगियो से खेलता हैं
अविकसित कुसुम
खिले बिना ही कुम्लहाते हैं
ओर हम
विवश हुए इस विराट को
भावों के नीर तले
कोसते सिसकते हैं
बड़ा सत्य साथी हो जाता
अंधकार
कि भूल भूलैया का यह जीवन
केवल रोशनी नहीं
कालिमा का दरिया भी हैं
जिसमें डूबे बिना
जीवन अधूरा हैं
यह सत्य अभी स्वीकारना
मर्म अदृश्य तक का
देता संयमित जीवन
वेदना का सार पाये ही
निखरता हैं
अंधकार तुझे मिटाने का
हमारा प्रयास
जीवन नहीं सत्य की
मृत्यु ही हैं ।
छगन लाल गर्ग।
अंधकार का कालापन
क्या यह झलक हैं
रोशनी का अस्तित्व मिट जाय
खुली ऑखो को चुनौती नहीं
रोशनी की व्यर्थता साबित हो
ठीक हैं माना कि
हमारे प्रयास उपकरणों का अवलंबन लेकर
मिटाते हैं ऑखो की अंतिम पहुँच तक का अंधेरा
पर क्या काफी नहीं
साबित होता ही जाता
अंधेरे का अस्तित्व
स्वीकार करना ही होगा
अमिट हैं अंधेरा
नही उपाय कि रोको
उपाय होता भी हैं
पर मनुष्य के हाथों नही
समय आने पर सूर्य से
सूर्य भी समय से पहले
कहां मिटा पाता अंधेरा
स्वीकारना ही होगा
यह अंधेरा
ठीक वैसे ही
प्रकृति का अंधकार
हमारी जिन्दगियो से खेलता हैं
अविकसित कुसुम
खिले बिना ही कुम्लहाते हैं
ओर हम
विवश हुए इस विराट को
भावों के नीर तले
कोसते सिसकते हैं
बड़ा सत्य साथी हो जाता
अंधकार
कि भूल भूलैया का यह जीवन
केवल रोशनी नहीं
कालिमा का दरिया भी हैं
जिसमें डूबे बिना
जीवन अधूरा हैं
यह सत्य अभी स्वीकारना
मर्म अदृश्य तक का
देता संयमित जीवन
वेदना का सार पाये ही
निखरता हैं
अंधकार तुझे मिटाने का
हमारा प्रयास
जीवन नहीं सत्य की
मृत्यु ही हैं ।
छगन लाल गर्ग।