अपनापन तुम्हारा
बहुत भाता
कितना भाव विभोर होता
कैसे कहूँ
मेरे हर काम के
गुण अवगुण के पारखी हो तुम
बड़ी उपयोगी अवधारणा
देते जाते
कि मैं गदगद हूँ
परिमार्जित हुआ हूँ
संसर्ग तुम्हारा
गति देता हैं
समझना नहीं चाहता
कोई तथ्य
सच्चाई की धूरी का
तुम्हारा कथन ही सत्य
अच्छा लगता हैं
कितने गुणी तुम
करते जाते मेरे हर कदम की
जी भर तारिफ
लगने लगा हैं अब
उकता गया हूँ
भ्रम का यह घेरा
मेरी असलियत नहीं
प्रवंचना हैं
कि नहीं जानता खुद को
लोग कहते
वहीं सत्य होगा कैसे
खुद के समीप
मुझसे अधिक ओर नहीं
झाकने का अवसर कहां
प्रशंसा के अतिरेक मैं फसा फसा
अछूता जीने लगा हूँ
खुद को
यह दयनीय स्थिति मेरी
किसी ओर की प्रदेय नहीं
खुद के अहं निर्मित
होना होगा
अब तो थोड़ा चेतन
न हो ऐसा
कि जिन्दगी तुझे
जाने बिना
काले घने अंधेरो मे
तू गुम हो जाये।
छगन लाल गर्ग।
बहुत भाता
कितना भाव विभोर होता
कैसे कहूँ
मेरे हर काम के
गुण अवगुण के पारखी हो तुम
बड़ी उपयोगी अवधारणा
देते जाते
कि मैं गदगद हूँ
परिमार्जित हुआ हूँ
संसर्ग तुम्हारा
गति देता हैं
समझना नहीं चाहता
कोई तथ्य
सच्चाई की धूरी का
तुम्हारा कथन ही सत्य
अच्छा लगता हैं
कितने गुणी तुम
करते जाते मेरे हर कदम की
जी भर तारिफ
लगने लगा हैं अब
उकता गया हूँ
भ्रम का यह घेरा
मेरी असलियत नहीं
प्रवंचना हैं
कि नहीं जानता खुद को
लोग कहते
वहीं सत्य होगा कैसे
खुद के समीप
मुझसे अधिक ओर नहीं
झाकने का अवसर कहां
प्रशंसा के अतिरेक मैं फसा फसा
अछूता जीने लगा हूँ
खुद को
यह दयनीय स्थिति मेरी
किसी ओर की प्रदेय नहीं
खुद के अहं निर्मित
होना होगा
अब तो थोड़ा चेतन
न हो ऐसा
कि जिन्दगी तुझे
जाने बिना
काले घने अंधेरो मे
तू गुम हो जाये।
छगन लाल गर्ग।