Friday, June 10, 2016

चलते चलते

चलते चलते सचेत होता 
एकाग्रता टूटती
पाता हूँ सड़क की वहीं मुडेर
जहां अक्सर बैठता हूँ 
थके पैरों 
चार पाँच कुत्तों के साथ
रोटी के टुकड़े डालते
गंदे मैले एक फकीर को
रूकता हूँ
नमन अनायास ही होता
झुकता कहता हूँ
प्रणाम बाबा
ध्यान भंग करते
फकीर बैठने का इशारा करते
बैठता हूँ मैं
सीमेंट से बनी मुडेर
रेत की गंदगी से सटी
आज नहीं निकाल पाता हूँ
जेब मे मोडा अखबार का कागज
जिसे हमेशा बिछाकर
यही बैठता हूँ
बाबा की ओढी चादर
अनेको छेदो से घिरी
गंदी सी
आज शनिवार होने से
कुछ पैसे हैं मेरे पास
शनि मंदिर मे तेल सिन्दुर निमित्त
निकालता हूँ
बाबा के शरणो मे करता हूँ अर्पित
मुस्कराते हैं बाबा
बोलते नहीं
ओर उठ जाते है
पैसे वहीं
कुत्ते वहीं
बाबा नदी की ढलान से
नीचे उतरते जाते हैं
मैं मूक सा
देखता सौचता हूँ
क्या यह निर्लप्तता
सच्ची हैं
यदि हाँ तो क्या हम
धोखा जीते हैं
संचय गहराया जाता
जिन्दगी का मकसद ढूँढता जाता
बेबूझ हूँ अभी
कुछ समझ नहीं पाता।
छगन लाल गर्ग।