Friday, June 10, 2016

मेरी जिन्दगी

देता हूँ आकार अस्तित्व 
कि फिर रह न पाये भंवर बीच 
फसा घिरा
लहरों की थपेडे खाता
पाता हूँ झूझता आकार
संघर्ष भरा
अब पूरा बन्धोवस्त दिखाती
उताड़ग प्रचण्ड लहरे
नहीं हैं संदेह
कि बचूगा
प्राणों की ऊर्जा संग्रहीत
एक लक्ष्य
कि जीवन साबूत रहे
यह एकाग्रता
जीवन ओर मृत्यु का खेल
दोनों ही सत्य
पर सत्य इतना
कि प्रवंचना के इसी खेल की
कसी बान्धी मुट्ठी को
खोलता जाता हूँ
करता हूँ संघर्ष
कि रहे जीवन
क्यों
नहीं पता
ओर निष्कर्ष संघर्ष मात्र इतना
कि कुछ बाकी रहा
पूरा हो का संघर्ष पूर्णता का
नहीं होता पूरा
ओर यह जीजीविषा
नहीं छोडती मेरा पीछा
ओर देता जाता हूँ आकार
फसे भंवर
बचाने अस्तित्व
पूर्णता के हक का यह खेल
नित खेलता
करता हूँ संघर्ष लहरों से
बिना अंजाम का
संघर्ष छिडा हुआ हैं मेरा
यही सच शायद जीती जाती
मेरी जिन्दगी ।
छगन लाल गर्ग।