Friday, June 10, 2016

अनकही यादें

अनकही यादें 
सुलगती जाती
कह पाना होता हैं घातक 
नहीं मिलती संवेदना 
चर्चा बनती हैं हेय मानसिकता की
ओर हो जाता
घना मुश्किल जीना
दर्द यादों का
जमता सा हृदय शैल बना
पिघलना भूला
अब दिखता हैं तना तना
यह कठोरता
अब सतही नहीं
भीतरी हो चुकी
तरलता का स्त्रोत रीता हैं
विचारों के कंकड पत्थर
जमा दिये हैं व्यवस्थित
बन चुकी हैं दीवार
भीतर की मजबूत
अब नहीं ढहती संवेदनाओ से
युग की कठोरता को
कर चुका हूँ आत्मसात
सच कहूँ
अब नहीं करती तुम्हारी यादें
परेशान मुझे
होते ही ठोस पदार्थ
सभ्य भी सुसंस्कृत भी
कहती हैं दुनिया
अजीब हैं बड़ी मुद्दत बाद
मिला हैं नुस्खा जीने का
ओर यह
जिन्दगी पायी हैं मैंने
तुम्हारी यादों से
अच्छा हुआ तुम्हारा मिटना
समतल सपाट तो पाया
कि बढता हूँ नित जीने निमित्त
पत्थर बना
यान्त्रिक जीवन का पूर्जा हुआ
मेरी जिन्दगी
जीने लगा हूँ तुझे ।
छगन लाल गर्ग।