अनकही यादें
सुलगती जाती
कह पाना होता हैं घातक
नहीं मिलती संवेदना
चर्चा बनती हैं हेय मानसिकता की
ओर हो जाता
घना मुश्किल जीना
दर्द यादों का
जमता सा हृदय शैल बना
पिघलना भूला
अब दिखता हैं तना तना
यह कठोरता
अब सतही नहीं
भीतरी हो चुकी
तरलता का स्त्रोत रीता हैं
विचारों के कंकड पत्थर
जमा दिये हैं व्यवस्थित
बन चुकी हैं दीवार
भीतर की मजबूत
अब नहीं ढहती संवेदनाओ से
युग की कठोरता को
कर चुका हूँ आत्मसात
सच कहूँ
अब नहीं करती तुम्हारी यादें
परेशान मुझे
होते ही ठोस पदार्थ
सभ्य भी सुसंस्कृत भी
कहती हैं दुनिया
अजीब हैं बड़ी मुद्दत बाद
मिला हैं नुस्खा जीने का
ओर यह
जिन्दगी पायी हैं मैंने
तुम्हारी यादों से
अच्छा हुआ तुम्हारा मिटना
समतल सपाट तो पाया
कि बढता हूँ नित जीने निमित्त
पत्थर बना
यान्त्रिक जीवन का पूर्जा हुआ
मेरी जिन्दगी
जीने लगा हूँ तुझे ।
छगन लाल गर्ग।
सुलगती जाती
कह पाना होता हैं घातक
नहीं मिलती संवेदना
चर्चा बनती हैं हेय मानसिकता की
ओर हो जाता
घना मुश्किल जीना
दर्द यादों का
जमता सा हृदय शैल बना
पिघलना भूला
अब दिखता हैं तना तना
यह कठोरता
अब सतही नहीं
भीतरी हो चुकी
तरलता का स्त्रोत रीता हैं
विचारों के कंकड पत्थर
जमा दिये हैं व्यवस्थित
बन चुकी हैं दीवार
भीतर की मजबूत
अब नहीं ढहती संवेदनाओ से
युग की कठोरता को
कर चुका हूँ आत्मसात
सच कहूँ
अब नहीं करती तुम्हारी यादें
परेशान मुझे
होते ही ठोस पदार्थ
सभ्य भी सुसंस्कृत भी
कहती हैं दुनिया
अजीब हैं बड़ी मुद्दत बाद
मिला हैं नुस्खा जीने का
ओर यह
जिन्दगी पायी हैं मैंने
तुम्हारी यादों से
अच्छा हुआ तुम्हारा मिटना
समतल सपाट तो पाया
कि बढता हूँ नित जीने निमित्त
पत्थर बना
यान्त्रिक जीवन का पूर्जा हुआ
मेरी जिन्दगी
जीने लगा हूँ तुझे ।
छगन लाल गर्ग।