Sunday, June 12, 2016

फिर दोषी हुआ

फिर दोषी हुआ हूँ 
क्यों अनजान कहूँ 
जाने समझे मे ही तो हुआ 
जो पढ़े लिखे संस्कारी के लिए
कलंक हैं जीवन का
पर क्या मैं अपराध बोध का
कोई तर्क 
जो शब्दों का वजनी ताना
लिए काट सकूँगा
प्रयास यही हैं 
छाया सवेरे के बाद 
धीरे धीरे सूर्य चढ़ने के साथ साथ
तन चूभती काटती हैं 
ओर मैं 
पसीने के छीटे लिए
अधकचरी छाया चाहता चाहता
आगे चलता हूँ 
देखता हूँ 
एक लाल रंग की कार
मेरे घर की ओर बढते
फासला बाकी हैं 
मेरे ओर घर के बीच 
देखता हूँ 
पुत्र दौडता आता
रोकता मुझे 
अभी मत आना घर 
मम्मी ने कहा हैं 
स्तम्भित हुआ सा खड़ा हूँ 
छाया कहां बाहर घर
कई विचारों घिरा अछूत सा
खड़ा हूँ 
धूप प्रखरता से सेकती हैं मुझे 
रहा नहीं जाता
अस्तित्व घूमता सा पाता हूँ 
कदम स्वतः बढते घर की ओर
वहीं पाता हूँ 
गुरु देव पधारे हैं 
हरिद्वार वाले
चार चेले भी साथ हैं 
दण्डवत नमन बाद भीतर 
ले जाता हूँ 
तल्लीन सा प्रवचन सुनता हूँ 
नहाता ब्रह्म धारा मे
लय प्रभु स्वर भरती हैं चित मे
पर शब्द अंग्रेजी के
आधे अधूरे लय को अवरोध देते हैं 
विनित हुआ नाश्ता 
करवाता हूँ 
पाँच सौ एक शरणो मे
अर्पित करता हूँ 
चेले गुरु देव बीच फुसफुस चलती हैं 
ओर सचेत होता हूँ मैं 
छःहजार पाँच सौ का आदेश 
अर्पण का चेले सुनाते हैं 
कैश घर मे नहीं हैं 
पत्नी घूरती सी मुझे कहती हैं 
चैक बुक लाता हूँ 
चैक सुनील कुमार के नाम
काटने का देव वाक्य सुनता हूँ 
सादर गुरु जी को अभी अभी 
कार मे बिठाया हैं 
कदम दरवाजे रखते
मेरा परिवार अपराधी की
भाँति मुझे घूरने लगता हैं 
ओर मैं दोषी 
सिर झुकाये खड़ा हूँ
छगनलाल गर्ग।