फिर दोषी हुआ हूँ
क्यों अनजान कहूँ
जाने समझे मे ही तो हुआ
जो पढ़े लिखे संस्कारी के लिए
कलंक हैं जीवन का
पर क्या मैं अपराध बोध का
कोई तर्क
जो शब्दों का वजनी ताना
लिए काट सकूँगा
प्रयास यही हैं
छाया सवेरे के बाद
धीरे धीरे सूर्य चढ़ने के साथ साथ
तन चूभती काटती हैं
ओर मैं
पसीने के छीटे लिए
अधकचरी छाया चाहता चाहता
आगे चलता हूँ
देखता हूँ
एक लाल रंग की कार
मेरे घर की ओर बढते
फासला बाकी हैं
मेरे ओर घर के बीच
देखता हूँ
पुत्र दौडता आता
रोकता मुझे
अभी मत आना घर
मम्मी ने कहा हैं
स्तम्भित हुआ सा खड़ा हूँ
छाया कहां न बाहर न घर
कई विचारों घिरा अछूत सा
खड़ा हूँ
धूप प्रखरता से सेकती हैं मुझे
रहा नहीं जाता
अस्तित्व घूमता सा पाता हूँ
कदम स्वतः बढते घर की ओर
वहीं पाता हूँ
गुरु देव पधारे हैं
हरिद्वार वाले
चार चेले भी साथ हैं
दण्डवत नमन बाद भीतर
ले जाता हूँ
तल्लीन सा प्रवचन सुनता हूँ
नहाता ब्रह्म धारा मे
लय प्रभु स्वर भरती हैं चित मे
पर शब्द अंग्रेजी के
आधे अधूरे लय को अवरोध देते हैं
विनित हुआ नाश्ता
करवाता हूँ
पाँच सौ एक शरणो मे
अर्पित करता हूँ
चेले गुरु देव बीच फुसफुस चलती हैं
ओर सचेत होता हूँ मैं
छःहजार पाँच सौ का आदेश
अर्पण का चेले सुनाते हैं
कैश घर मे नहीं हैं
पत्नी घूरती सी मुझे कहती हैं
चैक बुक लाता हूँ
चैक सुनील कुमार के नाम
काटने का देव वाक्य सुनता हूँ
सादर गुरु जी को अभी अभी
कार मे बिठाया हैं
कदम दरवाजे रखते
मेरा परिवार अपराधी की
भाँति मुझे घूरने लगता हैं
ओर मैं दोषी
सिर झुकाये खड़ा हूँ ।
छगनलाल गर्ग।
क्यों अनजान कहूँ
जाने समझे मे ही तो हुआ
जो पढ़े लिखे संस्कारी के लिए
कलंक हैं जीवन का
पर क्या मैं अपराध बोध का
कोई तर्क
जो शब्दों का वजनी ताना
लिए काट सकूँगा
प्रयास यही हैं
छाया सवेरे के बाद
धीरे धीरे सूर्य चढ़ने के साथ साथ
तन चूभती काटती हैं
ओर मैं
पसीने के छीटे लिए
अधकचरी छाया चाहता चाहता
आगे चलता हूँ
देखता हूँ
एक लाल रंग की कार
मेरे घर की ओर बढते
फासला बाकी हैं
मेरे ओर घर के बीच
देखता हूँ
पुत्र दौडता आता
रोकता मुझे
अभी मत आना घर
मम्मी ने कहा हैं
स्तम्भित हुआ सा खड़ा हूँ
छाया कहां न बाहर न घर
कई विचारों घिरा अछूत सा
खड़ा हूँ
धूप प्रखरता से सेकती हैं मुझे
रहा नहीं जाता
अस्तित्व घूमता सा पाता हूँ
कदम स्वतः बढते घर की ओर
वहीं पाता हूँ
गुरु देव पधारे हैं
हरिद्वार वाले
चार चेले भी साथ हैं
दण्डवत नमन बाद भीतर
ले जाता हूँ
तल्लीन सा प्रवचन सुनता हूँ
नहाता ब्रह्म धारा मे
लय प्रभु स्वर भरती हैं चित मे
पर शब्द अंग्रेजी के
आधे अधूरे लय को अवरोध देते हैं
विनित हुआ नाश्ता
करवाता हूँ
पाँच सौ एक शरणो मे
अर्पित करता हूँ
चेले गुरु देव बीच फुसफुस चलती हैं
ओर सचेत होता हूँ मैं
छःहजार पाँच सौ का आदेश
अर्पण का चेले सुनाते हैं
कैश घर मे नहीं हैं
पत्नी घूरती सी मुझे कहती हैं
चैक बुक लाता हूँ
चैक सुनील कुमार के नाम
काटने का देव वाक्य सुनता हूँ
सादर गुरु जी को अभी अभी
कार मे बिठाया हैं
कदम दरवाजे रखते
मेरा परिवार अपराधी की
भाँति मुझे घूरने लगता हैं
ओर मैं दोषी
सिर झुकाये खड़ा हूँ ।
छगनलाल गर्ग।