पीछे लौटू कैसे
कोई उपाय दिखता नहीं
सृजन मेरे
तेरी पीड़ा कसक घनी हैं
सहू भी कैसे
नदी बन बहते
कभी उन्माद नशे मे
कभी विरह शिथिल राग बनी
बचू कैसे
उपाय हैं कहां
बहा ले मुझे
तेरी मरजी जहाँ
पीडा बड़ी लिए आता बहने
विलिन होने तुझमे
पर तू
बड़ी दूर हो जाती हो
उसी पल
जब मैं पहुँचता तेरे मुहाने
ओर राग धार
फिर फिर बढ़ती
प्राण घिरती तुझे पाने को
मेरी कविता
आओ तो देखो तो
मेरी दशा
जानता ऐसा दर्द तेरा
मिले मुझे
शायद तब बसता
अब तो विरह दर्द तेरा
रग रग भरा बहा
प्रवाह पीड़ा
अब प्रार्थना बनी हैं
मेरा सौभाग्य बनी हैं
ओर नेह राग
ढाई आखर हुआ
अग्रिम यात्रा का
होसला बना हैं मेरा ।
छगन लाल गर्ग।
कोई उपाय दिखता नहीं
सृजन मेरे
तेरी पीड़ा कसक घनी हैं
सहू भी कैसे
नदी बन बहते
कभी उन्माद नशे मे
कभी विरह शिथिल राग बनी
बचू कैसे
उपाय हैं कहां
बहा ले मुझे
तेरी मरजी जहाँ
पीडा बड़ी लिए आता बहने
विलिन होने तुझमे
पर तू
बड़ी दूर हो जाती हो
उसी पल
जब मैं पहुँचता तेरे मुहाने
ओर राग धार
फिर फिर बढ़ती
प्राण घिरती तुझे पाने को
मेरी कविता
आओ तो देखो तो
मेरी दशा
जानता ऐसा दर्द तेरा
मिले मुझे
शायद तब बसता
अब तो विरह दर्द तेरा
रग रग भरा बहा
प्रवाह पीड़ा
अब प्रार्थना बनी हैं
मेरा सौभाग्य बनी हैं
ओर नेह राग
ढाई आखर हुआ
अग्रिम यात्रा का
होसला बना हैं मेरा ।
छगन लाल गर्ग।