Saturday, June 11, 2016

होसला

पीछे लौटू कैसे 
कोई उपाय दिखता नहीं 
सृजन मेरे 
तेरी पीड़ा कसक घनी हैं 
सहू भी कैसे
नदी बन बहते 
कभी उन्माद नशे मे
कभी विरह शिथिल राग बनी 
बचू कैसे 
उपाय हैं कहां 
बहा ले मुझे 
तेरी मरजी जहाँ 
पीडा बड़ी लिए आता बहने
विलिन होने तुझमे
पर तू
बड़ी दूर हो जाती हो
उसी पल
जब मैं पहुँचता तेरे मुहाने
ओर राग धार
फिर फिर बढ़ती 
प्राण घिरती तुझे पाने को
मेरी कविता 
आओ तो देखो तो
मेरी दशा
जानता ऐसा दर्द तेरा
मिले मुझे 
शायद तब बसता
अब तो विरह दर्द तेरा
रग रग भरा बहा
प्रवाह पीड़ा 
अब प्रार्थना बनी हैं 
मेरा सौभाग्य बनी हैं 
ओर नेह राग 
ढाई आखर हुआ 
अग्रिम यात्रा का
होसला बना हैं मेरा
छगन लाल गर्ग।