मित्र मेरे
अजीब लगता हैं
पल प्रेम का यह दिव्य
अवसर
कहां हो पाता
हर किसी के जी का आधार
कसमकस का गणित
प्रेम को कहां सुहाता
यह कहां हैं बँधी बधाई लकीर
कि राह यही पाये प्रेम चले
यह तो चित की पागल दशा हैं
श्रृद्धा हैं यह
तर्क कहां यहाँ
स्वच्छन्दता ऐसी
जो प्रतिपल स्वतः घटती हैं
कैसे करू इसकी मैं
आज भविष्य वाणी
जादू हैं प्रेम
जहाँ हमारा तुम्हारा
अस्तित्व खोता हैं
कहां होते हम विलग
होते मित्र एकाकार
यदि कहीं रहता
तो केवल प्रेम
उसी का अस्तित्व
मात्र हृदय तंत्री वीणा के तार
मादक उभार
स्वर रागिणी ऑख ओर
चित को विलय किये
नाच उठती
गा उठती
घुघरू बजते हैं
पर भीतर के
दिव्यता केवल यही मिलती मित्र
सार्थक होता
तभी तभी
मेरा मानव होना।
छगनलाल गर्ग।
अजीब लगता हैं
पल प्रेम का यह दिव्य
अवसर
कहां हो पाता
हर किसी के जी का आधार
कसमकस का गणित
प्रेम को कहां सुहाता
यह कहां हैं बँधी बधाई लकीर
कि राह यही पाये प्रेम चले
यह तो चित की पागल दशा हैं
श्रृद्धा हैं यह
तर्क कहां यहाँ
स्वच्छन्दता ऐसी
जो प्रतिपल स्वतः घटती हैं
कैसे करू इसकी मैं
आज भविष्य वाणी
जादू हैं प्रेम
जहाँ हमारा तुम्हारा
अस्तित्व खोता हैं
कहां होते हम विलग
होते मित्र एकाकार
यदि कहीं रहता
तो केवल प्रेम
उसी का अस्तित्व
मात्र हृदय तंत्री वीणा के तार
मादक उभार
स्वर रागिणी ऑख ओर
चित को विलय किये
नाच उठती
गा उठती
घुघरू बजते हैं
पर भीतर के
दिव्यता केवल यही मिलती मित्र
सार्थक होता
तभी तभी
मेरा मानव होना।
छगनलाल गर्ग।