Saturday, June 4, 2016

अन्वेषण अपूर्ण

अन्वेषण अपूर्ण 
ओर यह निश्चित कि
सूक्ष्म दृष्टि असंभव 
आकांक्षी व्यक्तित्व
अबोध हर संसारी 
स्थूल का क्षण चाहत उसकी
पाता सहज सारवान 
महसूस करता उसी मे
अनुभूति का गहरापन
देहिक संबंधो की बढती 
अपूरणीय तृष्णा 
संवितरण करता जाता 
अपने निर्मित संकुल 
प्रिय का आत्मीय नेह बन 
आभासित 
संभागीय अपनत्व देता 
पर अधूरा रह जाता 
निश्छल प्राणों का भीतरी गूँजन
रागात्मक अनुभूति पाये बिना 
कही गहरे मे अदृश्य रहा
अपनत्व मे घूला स्वार्थ का रंग 
गहनतम अंतरंग नेह 
स्थूल रस का पारखी 
डूबता उतरता 
वासना के अंधे कुएँ 
ओर देता पहचान नीजत्व की
जहां अनंत
आकांक्षाओ का रेला 
बहता गंदे नद की तरह 
धार देता घीसता जाता 
व्यक्ति चेतना की जमीन 
ओर ससीम जीवन
सरकता जाता 
अधूरी अतृप्त 
सूक्ष्म अनुभूतिओं से तप्त
अचेतन की 
गहन अंधकारमय कंदरा मे
विलय होने 
अभागे पन की कसक लिए 
क्या हो वासना की आँधी से
मन की चेतना के दीये 
हमारे स्थूल मोह 
बुझते रहेंगे निरंतर
छगन लाल गर्ग