Saturday, June 4, 2016

भावना

आये थे 
भावना जगाने युगों की
अचेत मृत प्राय घोषित 
अब नही रहे वे लोग 
नीति कथनी पर
सत्य मर्यादा निमित्त 
सर्वस्व लुटाने वाले हरिचंद्र
मुर्खता का सबूत 
अनजान रहते सभ्यता से
हांफता दौडता युग नया
तनिक भी 
क्षण का नही भरोसा 
कब है या नही अस्थिर 
ओर नीति कथन 
आज नही सामयिक 
मानव मूल्यों का 
मनोविज्ञान 
अब आस्था पर नही 
तर्क कसौटी तुलते
सुनो कहना मानो 
जीना अपना 
हो सके शीर्षस्थ
तमाम भौतिकता संग 
किसी भी साधन से 
नही फर्क अच्छा बुरा 
परिणाम पाया यथार्थ 
देता पहचान हमारी 
सद्भावना सहयोग सत्य 
ओर यही सत्य देता भाव
हम बन सके हरिचंद्र 
सत्य साबित करते अपना 
तर्क से भी धन से भी 
ओर भावना से भी
छगन लाल गर्ग