आये थे
भावना जगाने युगों की
अचेत मृत प्राय घोषित
अब नही रहे वे लोग
नीति व कथनी पर
सत्य मर्यादा निमित्त
सर्वस्व लुटाने वाले हरिचंद्र
मुर्खता का सबूत
अनजान रहते सभ्यता से
हांफता दौडता युग नया
तनिक भी
क्षण का नही भरोसा
कब है या नही अस्थिर
ओर नीति कथन
आज नही सामयिक
मानव मूल्यों का
मनोविज्ञान
अब आस्था पर नही
तर्क कसौटी तुलते
सुनो कहना मानो
जीना अपना
हो सके शीर्षस्थ
तमाम भौतिकता संग
किसी भी साधन से
नही फर्क अच्छा बुरा
परिणाम पाया यथार्थ
देता पहचान हमारी
सद्भावना सहयोग सत्य
ओर यही सत्य देता भाव
हम बन सके हरिचंद्र
सत्य साबित करते अपना
तर्क से भी धन से भी
ओर भावना से भी ।
छगन लाल गर्ग ।
भावना जगाने युगों की
अचेत मृत प्राय घोषित
अब नही रहे वे लोग
नीति व कथनी पर
सत्य मर्यादा निमित्त
सर्वस्व लुटाने वाले हरिचंद्र
मुर्खता का सबूत
अनजान रहते सभ्यता से
हांफता दौडता युग नया
तनिक भी
क्षण का नही भरोसा
कब है या नही अस्थिर
ओर नीति कथन
आज नही सामयिक
मानव मूल्यों का
मनोविज्ञान
अब आस्था पर नही
तर्क कसौटी तुलते
सुनो कहना मानो
जीना अपना
हो सके शीर्षस्थ
तमाम भौतिकता संग
किसी भी साधन से
नही फर्क अच्छा बुरा
परिणाम पाया यथार्थ
देता पहचान हमारी
सद्भावना सहयोग सत्य
ओर यही सत्य देता भाव
हम बन सके हरिचंद्र
सत्य साबित करते अपना
तर्क से भी धन से भी
ओर भावना से भी ।
छगन लाल गर्ग ।