करता हूँ कोशिश
जमी रहे जडे
अस्तित्व की
वास्तविकता में
तभी घटित हो सकता
जीवन का यथार्थ
जिसमें पूर्णता मिल सके
सत्य की
बहुत हैं संघर्ष
ओरों से ज्यादा
स्वयं के साथ
यह लड़ाई स्वयं से बहुत
मर्मांत घाती
टूटना पडता व्यक्तित्व से
ओछापन घेरता जाता
हर पल
ओर तब कहीं भीतर ही भीतर
अप्रकट अहसासों मे
हल्की सी सुगंध का
भान देता सत्य
वास्तविक मर्म उभारने लगता
ओर तब जिन्दगी जीना
नहीं रहता आम बनकर आसान
जरूरत होती साहस की
खुद से खुद को मिटाने की
स्व ऊर्जा संजोनी हो जाती मुश्किल
बनावट की दुनिया में
बाहर का सुख पलता विकसता
मात्र अहंकार अनैसर्गिक रूतबे से
पर भीतर बहुत गहरे तक
केवल रीतेपन का दर्द
दबाना होता स्वयं को विसर्जन कर
अंतर्मन का अंतराल रोशनी से दूर
भूलता जीता विवशता भरा
अचेतन बेहोश जीवन
बेहतर हैं इससे सच्चे बने
प्रमाणित नहीं पर भीतरी सुख का राह
केवल यही से गुजरता ।
छगन लाल गर्ग।
जमी रहे जडे
अस्तित्व की
वास्तविकता में
तभी घटित हो सकता
जीवन का यथार्थ
जिसमें पूर्णता मिल सके
सत्य की
बहुत हैं संघर्ष
ओरों से ज्यादा
स्वयं के साथ
यह लड़ाई स्वयं से बहुत
मर्मांत घाती
टूटना पडता व्यक्तित्व से
ओछापन घेरता जाता
हर पल
ओर तब कहीं भीतर ही भीतर
अप्रकट अहसासों मे
हल्की सी सुगंध का
भान देता सत्य
वास्तविक मर्म उभारने लगता
ओर तब जिन्दगी जीना
नहीं रहता आम बनकर आसान
जरूरत होती साहस की
खुद से खुद को मिटाने की
स्व ऊर्जा संजोनी हो जाती मुश्किल
बनावट की दुनिया में
बाहर का सुख पलता विकसता
मात्र अहंकार अनैसर्गिक रूतबे से
पर भीतर बहुत गहरे तक
केवल रीतेपन का दर्द
दबाना होता स्वयं को विसर्जन कर
अंतर्मन का अंतराल रोशनी से दूर
भूलता जीता विवशता भरा
अचेतन बेहोश जीवन
बेहतर हैं इससे सच्चे बने
प्रमाणित नहीं पर भीतरी सुख का राह
केवल यही से गुजरता ।
छगन लाल गर्ग।