Saturday, June 11, 2016

राग प्रियतम

चेतना का हुआ हैं राग प्रियतम
स्मृति बना हैं अब भार लघुतम
मिट जाऊ हैं संताप अनुपम
विरह अभिशाप हैं प्राण असीम।
देह मिटी कुछ सार पाया
जगत मात्र हैं साथ छाया
रमण केवल वासना माया 
रस रूप गंध स्पर्श भाया
चल चले अब साथ कर ले
भर भर चित मे राग भर ले
प्रेम रस पीते उन्माद भर ले
मधु लहर भीडी स्वर सुन ले

व्यथा भंवर घेरता हो निखिल जैसे
करूणा भरती हो वियोग गान जैसे
भावना छिनती हो देह सुखधाम जैसे
कामना करती नित नया श्रृगार जैसे ।।
क्या बताऊ मैं हुआ हूँ भ्रमित जग सार।
आबाद दुनिया हैं विवर हूँ शून्य विहार
पवन गन्ध पराग बना भंवर का अंशतार।
पाया खोया हुआ किया जब चित विचार ।।
छगन लाल गर्ग।