चेतना का हुआ हैं राग प्रियतम
स्मृति बना हैं अब भार लघुतम
मिट न जाऊ हैं संताप अनुपम
विरह अभिशाप हैं प्राण असीम।
देह मिटी कुछ सार पाया
जगत मात्र हैं साथ छाया
रमण केवल वासना माया
रस रूप गंध स्पर्श भाया ।
चल चले अब साथ कर ले
भर भर चित मे राग भर ले
प्रेम रस पीते उन्माद भर ले
मधु लहर भीडी स्वर सुन ले ।
स्मृति बना हैं अब भार लघुतम
मिट न जाऊ हैं संताप अनुपम
विरह अभिशाप हैं प्राण असीम।
देह मिटी कुछ सार पाया
जगत मात्र हैं साथ छाया
रमण केवल वासना माया
रस रूप गंध स्पर्श भाया ।
चल चले अब साथ कर ले
भर भर चित मे राग भर ले
प्रेम रस पीते उन्माद भर ले
मधु लहर भीडी स्वर सुन ले ।
व्यथा भंवर घेरता हो निखिल जैसे ।
करूणा भरती हो वियोग गान जैसे ।
भावना छिनती हो देह सुखधाम जैसे ।
कामना करती नित नया श्रृगार जैसे ।।
क्या बताऊ मैं हुआ हूँ भ्रमित जग सार।
आबाद दुनिया हैं विवर हूँ शून्य विहार ।
पवन गन्ध पराग बना भंवर का अंशतार।
पाया खोया हुआ किया जब चित विचार ।।
छगन लाल गर्ग।
करूणा भरती हो वियोग गान जैसे ।
भावना छिनती हो देह सुखधाम जैसे ।
कामना करती नित नया श्रृगार जैसे ।।
क्या बताऊ मैं हुआ हूँ भ्रमित जग सार।
आबाद दुनिया हैं विवर हूँ शून्य विहार ।
पवन गन्ध पराग बना भंवर का अंशतार।
पाया खोया हुआ किया जब चित विचार ।।
छगन लाल गर्ग।