दीप प्रज्वंलित हुआ हैं प्राण रे सुन
कर्म मिथ्या उजाडती तन उपवन
चंचल चितवन भ्रमित अब जीवन
कर्मण्यता पथ विचलित जन मन ।
राग कहां पिघलता रूगण्ता तपन
छाँव नज़र फिरकती अन्तराल बन
करवट नहीं अब तनिक दे चिन्तन
मंथन घना हैं मिलते नही मन मनन ।
वेदना की कसक का ठौर रे जीवन
चेतना का खिचकता सा हर्ष जीवन
कामना का वेग बहता ठहर रे जीवन
भावना भी पीर पातक संभाल जीवन ।।
छगन लाल गर्ग।
कर्म मिथ्या उजाडती तन उपवन
चंचल चितवन भ्रमित अब जीवन
कर्मण्यता पथ विचलित जन मन ।
राग कहां पिघलता रूगण्ता तपन
छाँव नज़र फिरकती अन्तराल बन
करवट नहीं अब तनिक दे चिन्तन
मंथन घना हैं मिलते नही मन मनन ।
वेदना की कसक का ठौर रे जीवन
चेतना का खिचकता सा हर्ष जीवन
कामना का वेग बहता ठहर रे जीवन
भावना भी पीर पातक संभाल जीवन ।।
छगन लाल गर्ग।