Saturday, June 11, 2016

सत्य यही

सत्य यही हो तुम 
तलाशी चित भ्रमित घना
दिखो ना
यही हो तुम 
ऑखो दिखते भी पल पल
जैसे ही करता रूख 
तुम्हारी ओर
अस्तित्व चिंता घेरती मुझे 
हर बार की तरह
ओर झुठलाता तुम्हें 
मिल जाता हूँ 
घूल जाता हूँ 
स्वार्थो मे जुटी भीड़ मे
तुम विवश से देखते मेरी ओर
सत्य तुम यही हो
सवेरे के तुतलाती जबान से
तुम माँगते रोटी के टुकड़े 
ऑखे भर उठती मेरी 
देखता तुम्हें 
सुनता हूँ फटकारे जाते हो
चिढिया चढती
मुँह फसाये दरवाजे की जालियो मे
गाय बने रोटी आस
गाय का रूप धरे
खड़े हो
ओर मालकिन लकड़ी लिए
हटाती तुम्हे
विवशता देखी तुम्हारी 
तुम घर के रहे ही घाट के
हर ओर तुम ही तुम 
दिखते तो हो
कहां नहीं तुम 
ओर गहरे तलाशी तुम्हारी
सिद्धांतो मे
शास्त्रो मे
प्रवचनो मे
सुनते पढ़ते थका थका सा
हूँ मैं 
सत्य मेरे आस पास
हो तुम 
अतृप्त पाता हूँ 
असार जीता हूँ 
आओ
मेरे हृदय भी रीता रीता
रहता हूँ
छगन लाल गर्ग।