सत्य यही हो तुम
तलाशी चित भ्रमित घना
दिखो ना
यही हो तुम
ऑखो दिखते भी पल पल
जैसे ही करता रूख
तुम्हारी ओर
अस्तित्व चिंता घेरती मुझे
हर बार की तरह
ओर झुठलाता तुम्हें
मिल जाता हूँ
घूल जाता हूँ
स्वार्थो मे जुटी भीड़ मे
तुम विवश से देखते मेरी ओर
सत्य तुम यही हो
सवेरे के तुतलाती जबान से
तुम माँगते रोटी के टुकड़े
ऑखे भर उठती मेरी
देखता तुम्हें
सुनता हूँ फटकारे जाते हो
चिढिया चढती
मुँह फसाये दरवाजे की जालियो मे
गाय बने रोटी आस
गाय का रूप धरे
खड़े हो
ओर मालकिन लकड़ी लिए
हटाती तुम्हे
विवशता देखी तुम्हारी
न तुम घर के रहे न ही घाट के
हर ओर तुम ही तुम
दिखते तो हो
कहां नहीं तुम
ओर गहरे तलाशी तुम्हारी
सिद्धांतो मे
शास्त्रो मे
प्रवचनो मे
सुनते पढ़ते थका थका सा
हूँ मैं
सत्य मेरे आस पास
हो तुम
अतृप्त पाता हूँ
असार जीता हूँ
आओ न
मेरे हृदय भी रीता रीता
रहता हूँ ।
छगन लाल गर्ग।
तलाशी चित भ्रमित घना
दिखो ना
यही हो तुम
ऑखो दिखते भी पल पल
जैसे ही करता रूख
तुम्हारी ओर
अस्तित्व चिंता घेरती मुझे
हर बार की तरह
ओर झुठलाता तुम्हें
मिल जाता हूँ
घूल जाता हूँ
स्वार्थो मे जुटी भीड़ मे
तुम विवश से देखते मेरी ओर
सत्य तुम यही हो
सवेरे के तुतलाती जबान से
तुम माँगते रोटी के टुकड़े
ऑखे भर उठती मेरी
देखता तुम्हें
सुनता हूँ फटकारे जाते हो
चिढिया चढती
मुँह फसाये दरवाजे की जालियो मे
गाय बने रोटी आस
गाय का रूप धरे
खड़े हो
ओर मालकिन लकड़ी लिए
हटाती तुम्हे
विवशता देखी तुम्हारी
न तुम घर के रहे न ही घाट के
हर ओर तुम ही तुम
दिखते तो हो
कहां नहीं तुम
ओर गहरे तलाशी तुम्हारी
सिद्धांतो मे
शास्त्रो मे
प्रवचनो मे
सुनते पढ़ते थका थका सा
हूँ मैं
सत्य मेरे आस पास
हो तुम
अतृप्त पाता हूँ
असार जीता हूँ
आओ न
मेरे हृदय भी रीता रीता
रहता हूँ ।
छगन लाल गर्ग।