Saturday, June 11, 2016

भीगा गान

शलभ छोड़ रे गूँजार अब तो
राग भीगा गान तेरा
तंरग का सा उन्माद भीगा
प्राण होता ओर गीला
थक जाती फिर चेतना भी
राग सूर नाजुक बन प्रहार करता
खण्डित बिखर तब राग रोते
पीर झेली टीस गहरी
भावना की मार गहरी
रेत बनी हैं चाह अब तो
जल नेत्र रीता 
जी रहा हूँ 
शलभ छोड रे राग अब तो
ताप दाह नहीं काम आता
तल जड मोटा घना हैं 
कसक सारी प्राण सोती
नीर का टोटा घना हैं 
राग हो गहरा तले का
भाव भीतर अस्तित्व का हो
विराम हैं चैतन्यता अब
राग तंत्री स्वर तेरे
छिद्र मर्म जानते हैं 
रहे रहे सार मेरा
अज्ञात राह जानते हैं 
छोड अब तू छोड़ जीवन 
राग तेरा ओर मेरा
हो चुका रे प्रातः का अब
अंत सा संध्या किनारा
राग धीमा प्राण ढीला
शान्त हैं मेरा किनारा
रे मुझे छेड अब तो
शलभ छोड रे राग अब तो।