सब भाव माँ भक्ति तेरी जुडते हैं
मन विभोर हो शरणो मे गिरता हूँ ।
मैं विलिन होता सा तुझमे माँ
आलाह्द राग तल्लीन स्वर सुनता हूँ ।
इस अर्पण मैं माँ तेरी कुछ ओर नहीं
केवल तन मन उत्सर्ग हुआ समझता हूँ ।
भक्ति धारा अविरल बहती सी नित
खोता सब कुछ गहरे डूबा उतरता रहता हूँ ।।
छगन लाल गर्ग।
मन विभोर हो शरणो मे गिरता हूँ ।
मैं विलिन होता सा तुझमे माँ
आलाह्द राग तल्लीन स्वर सुनता हूँ ।
इस अर्पण मैं माँ तेरी कुछ ओर नहीं
केवल तन मन उत्सर्ग हुआ समझता हूँ ।
भक्ति धारा अविरल बहती सी नित
खोता सब कुछ गहरे डूबा उतरता रहता हूँ ।।
छगन लाल गर्ग।