सत्य
कहते हैं
तुम कडवे हो
न तुम्हें सुनना ओर
न ही अपनाना अच्छा लगता
अब कारण
कुछ भी हो
मुझे या गेरो को
भाते कहां हो
जब भी तुम आते
हालाँकि बहुत कम
भीतर मेरे
उथल पुथल कर जाते हो
बना बनाया खेल
बिगाड देते मेरा
कितना रोकता हूँ तुम्हें
कि न आओ
मानते कहां हो
नुकसान हर बार आते
कर जाते
अब देखो न
खुशियों के वास्ते
जितने भी
झूठ फरेब मित्रो के सहयोग से
बनाता महल सुख के
कि तुम निष्ठुरता ढहा देते
सारे के सारे
फिर हो जाता हूँ
खजूर लटका सा
मेरे मित्र
झूठ फरेब कितने अच्छे
कि अच्छो अच्छो को चकमा
दिला मुझे पुष्ट करते
एक तुम हो
दुश्मनी निकालते कस कर
जितना कोशिश करता
तुम ओर नजदीक आते
दुरिया पाट देते
ओर मेरी तृष्णा की ऑखे
तुम्हें देखे देखे
रोशनी खो देती
अब लगता
मेरे रक्त मे विलय हुए
बहते हो
शायद एक बडा कारण
यही कि सक्षम होते भी
खरी खरी रहते तुम्हारे
कहता हूँ
धक्का खा खाकर भी
कहां छोड पाता तुम्हें
अंतिम कतार का व्यक्ति
बना खडा हूँ
देखता रहता
उन प्रथम पंक्ति वालो को
उनके कर्म मे
मैं। लज्जित हुआ
नित नित घूटता हूँ
सत्य यह घूटप भी तो
अमूल्य हैं
बन जाती राग प्राण मेरी
ओर फूटती झरना नेह बन
सच्चाई की निश्छल धार लिए
फिर कैसे ठहर पाते
झूठे फरेबी
अभी शान्त गति बहती
पर प्रचण्ड वेग का
राग स्वर
गहराया हैं ।
छगन लाल गर्ग।
कहते हैं
तुम कडवे हो
न तुम्हें सुनना ओर
न ही अपनाना अच्छा लगता
अब कारण
कुछ भी हो
मुझे या गेरो को
भाते कहां हो
जब भी तुम आते
हालाँकि बहुत कम
भीतर मेरे
उथल पुथल कर जाते हो
बना बनाया खेल
बिगाड देते मेरा
कितना रोकता हूँ तुम्हें
कि न आओ
मानते कहां हो
नुकसान हर बार आते
कर जाते
अब देखो न
खुशियों के वास्ते
जितने भी
झूठ फरेब मित्रो के सहयोग से
बनाता महल सुख के
कि तुम निष्ठुरता ढहा देते
सारे के सारे
फिर हो जाता हूँ
खजूर लटका सा
मेरे मित्र
झूठ फरेब कितने अच्छे
कि अच्छो अच्छो को चकमा
दिला मुझे पुष्ट करते
एक तुम हो
दुश्मनी निकालते कस कर
जितना कोशिश करता
तुम ओर नजदीक आते
दुरिया पाट देते
ओर मेरी तृष्णा की ऑखे
तुम्हें देखे देखे
रोशनी खो देती
अब लगता
मेरे रक्त मे विलय हुए
बहते हो
शायद एक बडा कारण
यही कि सक्षम होते भी
खरी खरी रहते तुम्हारे
कहता हूँ
धक्का खा खाकर भी
कहां छोड पाता तुम्हें
अंतिम कतार का व्यक्ति
बना खडा हूँ
देखता रहता
उन प्रथम पंक्ति वालो को
उनके कर्म मे
मैं। लज्जित हुआ
नित नित घूटता हूँ
सत्य यह घूटप भी तो
अमूल्य हैं
बन जाती राग प्राण मेरी
ओर फूटती झरना नेह बन
सच्चाई की निश्छल धार लिए
फिर कैसे ठहर पाते
झूठे फरेबी
अभी शान्त गति बहती
पर प्रचण्ड वेग का
राग स्वर
गहराया हैं ।
छगन लाल गर्ग।