एक बूँद
तरल सी
कहानी हमारी
लगती करूणामय
व्यथित भावनाऐ
भीतर भराव देती
ओर व्यक्ति
अभिव्यक्ति देता अपने अस्तित्व की
ओर सुख तलाश मे सक्रिय
रात दिन संलग्न
अब दृश्य बना बनावटी
जीवन नही रहा
वेदना शून्य
कोमल खिलते कुसुम
समय सत्य से पाते परिचय
अकाल
तीक्ष्ण ताप
पीडा बनकर जलन देता
मुरझाने लगते
कसक आहें लेते
घने दुख का धुँआ
हो उठता भारी असंतुलित
कालिमा काल घेराव
हो उठता अधिक भयावह
ईश्वरीय प्रेरणा की रश्मि
चमक देती तिमिर बन
ओर यह जीवन
लगने लगता
आसरा पाया सा
अनजान सत्ता
नही सामर्थ्य व्यक्तित्व
केवल
अहंकार भ्रम देता छल
ओर हम अकारण झूठ जीते
करते जाते प्रदर्शन
विभिन्न
सांसारिक संपदाओ का
जो कभी हमारे नही बने
फिसलकर दे जाते
खालीपन की असलियत
ओर हम
ताउम्र जीते अभिलाषाओ की
झूठी रंग बिरंगी विधुतिय रौशनी
जिसका उजाला
कभी हमारा नही हुआ
सत्य से विमुख जीवन
झेलता रहता नित
नये आश्चर्य
ओर भीतर मरता जाता
भावो का ममत्व
स्वार्थ की चाहत
यह अभिनय करते
हम निरंतर ओर
सरकते जाते गंदगी की खाई
क्या कहे
क्या होता अंजाम
नही यह सत्य
नही सुनना चाहता
आज का क्षण जीता मानव
आँसूओ का अस्तित्व नकारा हुआ
ओर गिरता मानवता मूल्य
हृदय हीनता हासिल
हार खाया
आज का मानव।
छगन लाल गर्ग ।
तरल सी
कहानी हमारी
लगती करूणामय
व्यथित भावनाऐ
भीतर भराव देती
ओर व्यक्ति
अभिव्यक्ति देता अपने अस्तित्व की
ओर सुख तलाश मे सक्रिय
रात दिन संलग्न
अब दृश्य बना बनावटी
जीवन नही रहा
वेदना शून्य
कोमल खिलते कुसुम
समय सत्य से पाते परिचय
अकाल
तीक्ष्ण ताप
पीडा बनकर जलन देता
मुरझाने लगते
कसक आहें लेते
घने दुख का धुँआ
हो उठता भारी असंतुलित
कालिमा काल घेराव
हो उठता अधिक भयावह
ईश्वरीय प्रेरणा की रश्मि
चमक देती तिमिर बन
ओर यह जीवन
लगने लगता
आसरा पाया सा
अनजान सत्ता
नही सामर्थ्य व्यक्तित्व
केवल
अहंकार भ्रम देता छल
ओर हम अकारण झूठ जीते
करते जाते प्रदर्शन
विभिन्न
सांसारिक संपदाओ का
जो कभी हमारे नही बने
फिसलकर दे जाते
खालीपन की असलियत
ओर हम
ताउम्र जीते अभिलाषाओ की
झूठी रंग बिरंगी विधुतिय रौशनी
जिसका उजाला
कभी हमारा नही हुआ
सत्य से विमुख जीवन
झेलता रहता नित
नये आश्चर्य
ओर भीतर मरता जाता
भावो का ममत्व
स्वार्थ की चाहत
यह अभिनय करते
हम निरंतर ओर
सरकते जाते गंदगी की खाई
क्या कहे
क्या होता अंजाम
नही यह सत्य
नही सुनना चाहता
आज का क्षण जीता मानव
आँसूओ का अस्तित्व नकारा हुआ
ओर गिरता मानवता मूल्य
हृदय हीनता हासिल
हार खाया
आज का मानव।
छगन लाल गर्ग ।